पुराणों में कहा जाता है कि पहले शिवा “आदि कैलाश” उत्तराखंड में ही रहते थे।
कैलाश को महादेव शिव का निवास स्थान माना जाता है ।
किसी कारणवश “आदि कैलाश” को छोड़कर तिब्बत स्थित” कैलाश पर्वत” पर चले गए।जिसे कैलाश मानसरोवर भी कहते है।पर्वत पवित्र होने के कारण इस पर्वत पर नही चढते।नीचे मानसरोवर मे स्नानकर कैलाश पर्वत की परिक्रमा कर पूजन-अर्चन करते है।
तिब्बत ऐतिहासिक रूप से हमेशा से अलग देश रहा है।
दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण भारत और चीन सहित किसी भी साम्राज्य के अधीन नही रहा।
1949 में चीन ने तिब्बत पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया।
इसके कुछ पहाड़ी क्षेत्रों को अपने क्षेत्र में मिलाया।
जिसमें” कैलाश मानसरोवर” को भी चीन ने अपने क्षेत्र मे मिला दिया। कैलाश मानसरोवर जाने के लिए भारतीय तीर्थ यात्रियों को चीन से वीजा लेना पड़ता है ।
अभी कुछ दिन पूर्व माननीय नरेंद्र मोदी जी द्वारा पिथौरागढ़ उत्तराखंड का दौरा किया गया ।
जिसमें उन्होंने “आदि कैलाश” जाकर पूजा अर्चना की
“आदि कैलाश” जाने के लिए भारत से कोई वीजा की आवश्यकता नहीं होती।
एक सामान्य सी औपचारिक परमिशन लेने की होती है ,क्योंकि यह क्षेत्र बॉर्डर पर स्थित है ।
यह यात्रा पिथौरागढ़ से तवा घाट तक बाय रोड की जा सकती है।
उसके पश्चात यह पैदल अथवा हेलीकॉप्टर के द्वारा आदि कैलाश पर पहुंचा जा सकता है।
तिब्बत और चीन सरकार ने इस पर्वत को पवित्र मानकर किसी भी पर्वतारोहण की अनुमति नही दी है।
नासा से अपने सैटेलाइट द्वारा अंतरिक्ष से कैलाश पर्वत की जांच की है।इसमे अद्भूत लाइट,शिव जी की मुखाकृति एवं पृथ्वी का केन्द्र बिन्दु देखा गया है।कूछ रहस्मय किरण,आवाज और चुम्बकीय शक्ति पाई गयी है।
आदि कैलाश एवं कैलाश मानसरोवर जीवन मे एक बार अवश्य करनी चाहिए।














