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हल्द्वानी। श्री रामलीला के प्रथम दिवस नारद मोह और रावण जन्म की लीला का मंचन हुआ, व्यास पुष्कर दत्त शास्त्री ने लीला का वर्णन करते हुए कहा महाराजा शीलनिधि की पुत्री राजकुमारी विश्वमोहिनी का स्वयंवर रचाया जाता है स्वयंवर के समय पर नारद जी राजा के दरबार पहुंचते हैं ।

महाराजा शीलनिधि द्वारा उनका सत्कार किया जाता है और विश्वमोहिनी का भाग्य देखने का अनुरोध किया जाता है नारद जी ने विश्व मोहिनी का हाथ देखा और उसके रूप को देखकर मुनि वैराग्य भूल गए और बड़ी देर तक उसकी ओर देखते ही रह गए।

उसके लक्षण देखकर मुनि अपने आपको भी भूल गए और हृदय में हर्षित हुए, पर प्रकट रूप में उन लक्षणों को नहीं कहा
कन्या के लक्षणों को सोचकर वे मन में कहने लगे कि जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जाएगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा।

यह शीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे, तो क्यूं न मैं स्वयं ही इसे वर लू, एसा सोंच कर भगवान श्री हरि के पास उनका रूप मांगने जाते हैं, भगवान श्री हरि नारदजी का अहंकार देख कर उन्हें हरि अर्थात बंदर का रूप दे देते हैं।

स्वयंवर में अपने अपमान के बाद भगवान विष्णु को श्राप देते हैं कि यही बंदर आपके त्रेता युग में काम आएगा और ऐसा ही स्त्री वियोग आपको भी सहना पड़ेगा।
उधर महर्षि बिश्वा के यहां रावण का जन्म होता है , रामलीला में आज व्यास पूजन बसंत अग्रवाल एवं हितेश पांडे ने किया।
रामलीला समिति के सदस्यों में प्रेम गुप्ता, अमित जोशी भोलेनाथ केसरवानी, मंजू वार्ष्णेय आदि ने उपस्थित अतिथियों का स्वागत किया।
कल को ब्रह्मा आदि देवताओं का आगमन, रावण अत्याचार एवं आकाशवाणी की लीला का मंचन होगा।

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