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नैनीताल। हाई कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐसे जोड़े (लड़का-लड़की) को फटकार लगाई, जिन्होंने अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी कर ली थी। अदालत ने कहा कि आप दोनों यहां क्या करने आए हैं।

जिन्होंने तुम्हारा लालन-पालन किया, उन्हीं से तुम सुरक्षा मांग रही हो। आखिर यह समाज किस दिशा में जा रहा है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस राकेश थपलियाल एक 18 वर्षीय युवती और एक 21 वर्षीय पुरुष की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। जिन्होंने हाल ही में एक मंदिर में विवाह किया था। कोर्ट को बताया गया कि युवती के परिवार वाले इस विवाह से सहमत नहीं थे और दंपति को उनसे धमकियों का सामना करना पड़ रहा था।

हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर सवाल उठाया कि क्या माता-पिता को अपने बच्चों की शादी में कोई दखल नहीं देना चाहिए, भले ही वे वयस्क हों। अदालत ने कहा कि यह किस तरह की शादी है? क्या बालिग होने मात्र से वे कुछ भी करेंगे? क्या उन्हें जन्म देने वाले माता-पिता की कोई राय नहीं चलेगी? पहले तो वे अपने पालन-पोषण करने वालों से पूछते भी नहीं और फिर उन पर धमकी देने का आरोप लगाते हुए याचिका दायर कर देते हैं। खारिज! जज ने कहा कि समाज किस दिशा में जा रहा है? माता-पिता ने उन्हें जन्म दिया है, फिर भी उनकी इच्छा का कोई महत्व नहीं है।

पीठ ने आगे टिप्पणी की कि दंपति को अदालत का रुख करने के बजाय अपने माता-पिता के पास लौट जाना चाहिए। जज ने कहा कि पहले अपने माता-पिता से पूछो। उन्होंने तुम्हें जन्म दिया और कितनी कठिनाइयों के साथ पाला-पोसा, और अब वे तुम्हारे दुश्मन हैं? तुम्हें खतरा महसूस होता है और तुम चाहते हो कि हम पुलिस को तुम्हारे माता-पिता को गिरफ्तार करने का निर्देश दें क्योंकि तुम्हें शादी करनी है? इसी के साथ कोर्ट ने 10 लाख रुपये के जुर्माने के साथ मामला खारिज करो! … वे यहां क्यों आए हैं? अपने माता-पिता के पास जाओ? जो अपने माता-पिता का सम्मान नहीं करते, उनके लिए यहां कोई जगह नहीं है। अपनी सुरक्षा का इंतजाम खुद करो, क्योंकि कानून ऐसे लोगों का साथ नहीं दे सकता।

जस्टिस राकेश थपलियाल ने कहा, “ये किस तरह की शादी है? क्या बालिग होने के कारण वे कुछ भी करेंगे? क्या उन्हें जन्म देने वाले माता-पिता की कोई राय नहीं सुनी जाएगी?

अदालत ने ज्यादातर दंपत्ति का प्रतिनिधित्व कर रहे वकीलों को हिंदी में संबोधित किया। एक समय तो न्यायालय ने मामले को कुछ देर के लिए स्थगित कर दिया और याचिकाकर्ता महिला से उसकी मां का फोन नंबर लाने को कहा। न्यायालय ने कहा कि वह उससे बात करना चाहता है।

जज ने कहा, “हम तुम्हारी मां से बात करेंगे और कम से कम उन्हें यह बता देंगे कि उनकी बेटी यहां है। अगर कल वह पूछे कि हमने शादी की अनुमति कैसे दी?”

अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि महिला ने केवल ग्यारहवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की थी। यह भी बताया गया कि उसका साथी एक निजी कंपनी में काम करता है।

आखिर में कोर्ट ने महिला के माता-पिता से बात न करने का निर्णय लिया। दंपति की उम्र और उनके वैवाहिक जीवन को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने पाया कि राज्य एजेंसियों पर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का कानूनी दायित्व है।

कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए पुलिस को निर्देश दिया गया कि वह दंपति की खतरे की आशंका का आकलन करे और उनके जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए।

इसके अलावा, अदालत ने पुलिस को यह भी निर्देश दिया कि वह महिला के माता-पिता से कहे कि वे कानून को अपने हाथ में न लें।

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