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देश में इन दिनों होली के उत्सव पर रंगों की धूम है। पर सीमांत के करीब 12 गांव ऐसे हैं, जहां रंग खेलना तो दूर लोगों को टीका तक नहीं लगाते हैं। ऐसा नहीं है कि यहां के लोग होली से अंजान हैं।

गांव के लोग मिलकर होली को उत्साह से मनाते थे।

धार्मिक मान्यताओं और लगातार हुए हादसों के कारण आठ दशकों से गांव के लोगों ने होली से दूरी बना रखी है। ग्रामीणों का मानना है कि अगर गांव में होली मनाई तो अशुभ घटना हो सकती है। कुरीजिमिया के पूर्व प्रधान देवेंद्र सिंह बताते हैं कि 82 सालों से होली पर कोई कार्यक्रम नहीं होता।

लोग होली का टीका तक नहीं लगाते। उन्होंने कहा कि पहले गांवों में उत्साह से होली मनाई जाती थी। होल्यार गायन करते हुए एक गांव से दूसरे गांव जाकर उत्साह से होली मनाते थे और गीत गाते थे। इसके बाद गांव में लगातार होली पर कुछ न कुछ हादसे होने लगे।

इसे देखते हुए सभी ने होली न मनाने का फैसला किया था। बरनिया गांव के पूर्व प्रधान मोहन दोसाद ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के चलते लोगों ने होली मनानी बंद की और उसके बाद से सब कुछ ठीक रहने लगा। अब होली के दौरान गांव में सन्नाटा रहता है।

इन गांव में नहीं मनाते हैं होली
मुनस्यारी विकासखंड के हरकोट, मटेना, पापड़ी, पैकुती, बर्निया, रींगू, चुलकोट, होकरा, नामिक, गौला, जरथी, खोयम आदि गांवों में होली नहीं मनाई जाती। यहां की आबादी 10 हजार से ज्यादा है।

गांव से बाहर बसे लोग परम्पराओं से दूर
इन गांवों के कई लोग जिला मुख्यालय और दूसरे जनपदों में रह रहे हैं। वहां पर वह होली को उत्साह से मनाते हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि गांव में होली मनाने की अनुमति नहीं है। उनका कहना है कि गांव से बाहर होने पर वो होली मनाते हैं, पर गांव आकर वह धार्मिक मान्यताओं को मानते हैं।

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