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गौलापार निवासी आरटीआई कार्यकर्ता रविशंकर जोशी ने मांगी सूचना 

जानकारी के अनुसार, वर्ष 2022 में इस जमीन पर 111 रजिस्ट्री हुई

जिसमें 109 मुस्लिम समुदाय के नाम 

हल्द्वानी। गौलापार में सरकारी व निजी जमीन पर एक और ‘बनभूलपुरा’ की  शुरूआत हो चुकी है। ग्राम देवला तल्ला में निजी जमीन पर अवैध कालोनी बनाकर कई आशियाने बन चुके हैं।

प्राधिकरण के नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गई हैं।खेती के लिए दी गई वन भूमि पर सैकड़ों मुस्लिमों के बसने क्रम अब भी जारी है।

इतना सब होने के बाद न तो प्रशासन चेत रहा, न ही वन विभाग के अधिकारी। केवल कागजी औपचारिकता की जा रही है।

गौलापार को जाते समय पुल पार करते ही दो सड़कें हैं। एक सड़क स्टेडियम व दूसरी सड़क ग्राम देवला तल्ला को जोड़ती है। इसी देवला तल्ला गांव में एक व्यक्ति ने वर्ष 2018 के बाद से अवैध प्लाटिंग शुरू की।

अब तक करीब 300 से अधिक प्लाट काटे जा चुके हैं और 10 से अधिक मकान बनकर खड़े हो गए हैं।

गौलापार निवासी आरटीआइ कार्यकर्ता रविशंकर जोशी की ओर से मांगी ।

जानकारी के अनुसार, वर्ष 2022 में इस जमीन पर 111 रजिस्ट्री हुई, जिसमें 109 मुस्लिम समुदाय के नाम हुई।

प्राधिकरण न्यायालय ने अगस्त 2023 में बिना नक्शा पास कराए जमीन पर प्लाटिंग करने पर जमीन सील करने, दाखिल खारिज रद करने व भवनों को ध्वस्त करने के निर्देश दिए थे, मगर छह माह बाद भी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं हुई है।

जिस जमीन पर प्लाटिंग हुई है, उसका विनियमितीकरण एक व्यक्ति के नाम से हुआ था। प्लाटिंग करने वाले ने जमीन का बड़ा हिस्सा खरीदा। फरवरी 2023 से इस जमीन की खरीद-फरोख्त पर रोक लगी है। आरटीआइ एक्टिविस्ट का आरोप है कि दाखिल खारिज के बाद जमीन की रजिस्ट्री भी होती रही।

ग्राम देवला तल्ला में जिस जमीन पर प्लाटिंग हुई है, वहां रहने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि उसने 100 स्क्वायर फीट का प्लाट दो साल पहले 15 लाख में खरीदा था।

इस जमीन के रेट अब बढ़कर दो हजार से 25 सौ रुपये स्क्वायर फिट हो चुके हैं। यहां जिन 10 लोगों के घर हैं, वह सभी मुस्लिम समुदाय के हैं।

कभी पंत फार्म और अब मलिक कालोनी की जमीन 100 रुपये के स्टांप पेपर पर बेची गई है। एक प्लाट खरीदने में लोगों ने 29 लाख रुपये तक खर्च किए हैं।

वन विभाग के रिकार्ड के अनुसार, राम प्रकाश ने इंतियात को 22.25 लाख में, सलीम अख्तर ने गुलशन को चार लाख रुपये में जमीन बेची। ऐसे ही कई अनगिनत और उदाहरण हैं।

प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों व प्रापर्टी डीलरों ने मिलीभगत से उत्तराखंड के कई पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्र में हजारों बाहरी लोगों की घुसपैठ करा दी है। इन घुसपैठियों को बिजली-पानी-सड़क सहित सभी सुविधाएं दी गई हैं।

इन बाहरी लोगों की घुसपैठ से उत्तराखंड के शांत पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्र अब अतिसंवेदनशील क्षेत्र में बदल चुके हैं। डेमोग्राफी में बदलाव की शिकायत शासन-प्रशासन से कई बार की और जांच समिति भी गठित हुई, पर जिला प्रशासन वर्षों से जांच पर कुंडली मारकर बैठ गया है।

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