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उत्तराखंड में त्रिस्तरीय पंचायतों में नियुक्त प्रशासकों का कार्यकाल अब नहीं बढ़ाया जाएगा।

राज्य सरकार ने पंचायत चुनाव की तैयारियां पूरी कर ली हैं और अगले दो महीने के भीतर चुनाव संपन्न कराने का निर्णय लिया गया है।

सहकारिता सचिव चंद्रेश कुमार ने जानकारी दी कि पंचायत चुनाव के लिए राज्य निर्वाचन आयोग से चर्चा हो चुकी है. हालांकि अभी चुनाव की तिथि घोषित नहीं हुई है, लेकिन विभाग पूरी तरह से तैयार है।

प्रदेश में कुल 7832 ग्राम पंचायतें, 3162 क्षेत्र पंचायतें और 385 जिला पंचायतें हैं. वर्ष 2019 में हुए पंचायत चुनाव में निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल 2024 में समाप्त हो गया था।

इसके बाद शासन ने पंचायतों का संचालन करने के लिए ग्राम पंचायतों, क्षेत्र पंचायत प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के पदों पर प्रशासक नियुक्त किए थे।

जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल 1 जून को समाप्त होगा

इन प्रशासकों में अधिकतर निवर्तमान पंचायत प्रतिनिधियों को ही दोबारा प्रशासक नियुक्त किया गया था. शुरुआत में इनका कार्यकाल छह महीने के लिए तय किया गया था, लेकिन अब सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि इस अवधि में कोई वृद्धि नहीं की जाएगी।

प्रदेश सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासकों का कार्यकाल जून में समाप्त हो जाएगा. जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल 1 जून 2025 को खत्म होगा. ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 10 जून 2025 तक समाप्त हो जाएगा. यदि निर्धारितसमय में चुनाव नहीं कराए गए तो पंचायतों में प्रशासनिक शून्यता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी

हरिद्वार में होंगे अगले साल चुनाव

विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, पंचायत चुनाव के लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली गई है. परिसीमन की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है. पंचायतों में आरक्षण का निर्धारण भी किया जा चुका है. इसके अलावा मतदाता सूची का पुनरीक्षण और मतदान केंद्रों की व्यवस्था को अंतिम रूप दे दिया गया है।

अब केवल राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की अधिसूचना जारी किया जाना बाकी है. हरिद्वार को छोड़कर राज्य के सभी जिलों में पंचायत चुनाव कराए जाएंगे।

हरिद्वार में पंचायत चुनाव अगले वर्ष होंगे, क्योंकि वहां चुनावी प्रक्रिया वर्ष 2020 में हुई थी।

दो महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराना जरूरी

प्रदेश में अगले दो महीने के भीतर पंचायत चुनाव नहीं कराए गए तो बरसात के मौसम में इसे कराना बेहद मुश्किल हो जाएगा. बरसात के दौरान पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन, सड़कों के बंद होने और मौसम की विषम परिस्थितियों के कारण मतदान प्रभावित हो सकता है।

इसी वजह से सरकार पंचायत चुनाव को जल्द से जल्द कराने के पक्ष में है, ताकि बरसात के दौरान अव्यवस्थाओं से बचा जा सके. पंचायत चुनाव में प्रशासन को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. जिसमें सरकार को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।

भौगोलिक चुनौतियां- पर्वतीय इलाकों में दूरदराज के क्षेत्रों तक चुनावी सामग्री पहुंचाना और कर्मचारियों की तैनाती चुनौतीपूर्ण होगी।

मानसून का प्रभाव- बरसात के मौसम में भूस्खलन और मार्ग अवरुद्ध होने की संभावना अधिक रहती है, जिससे मतदान प्रभावित हो सकता है।

सुरक्षा व्यवस्था- चुनाव के दौरान संवेदनशील और अति संवेदनशील बूथों पर पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती होगी।

चुनाव प्रक्रिया में हरिद्वार को शामिल नहीं किया जाएगा, क्योंकि वहां वर्ष 2020 में चुनाव कराए गए थे. अन्य सभी जिलों में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव संपन्न कराए जाएंगे।

यदि निर्धारित समय में चुनाव नहीं कराए गए तो पंचायतों में प्रशासनिक शून्यता की स्थिति बन जाएगी. इससे ग्राम विकास योजनाएं, ग्रामीण क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्य और अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं के संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

राज्य सरकार को उम्मीद है कि पंचायत चुनाव के बाद स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों की भागीदारी से विकास कार्यों को गति मिलेगी. चुनी हुई पंचायतें स्थानीय स्तर पर विकास योजनाओं का क्रियान्वयन अधिक प्रभावी ढंग से कर सकेंगी।

पंचायत चुनाव के मुख्य बिंदु

कुल पंचायतें- 7832 ग्राम पंचायतें, 3162 क्षेत्र पंचायतें और 385 जिला पंचायतें

प्रशासकों का कार्यकाल- जून 2025 में समाप्त

चुनाव की समयसीमा- दो महीने के भीतर

हरिद्वार को छोड़कर अन्य जिलों में होंगे चुनाव

उत्तराखंड में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का आयोजन समय पर करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।

यदि दो महीने के भीतर चुनाव नहीं कराए गए तो बरसात के दौरान चुनावी प्रक्रिया बाधित हो सकती है. प्रशासन चुनाव को लेकर पूरी तरह तैयार है और अब राज्य निर्वाचन आयोग की अधिसूचना का इंतजार है।

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