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उत्तराखंड की शांत वादियों में अब भी गूंजती है 22 साल की अंकिता भंडारी की चीख।

रिपोर्टर गुड्डू सिंह ठठोला 

पौड़ी जिले की डोभ श्रीकोट की रहने वाली अंकिता, जो यमकेश्वर के वनंत्रा रिज़ॉर्ट में नौकरी करती थी, अब हमारे बीच नहीं है। उसे न्याय दिलाने के नाम पर समाज, सिस्टम और सत्ता ने कितनी परीक्षाएं दीं, यह कहानी अब अदालतों के फाइलों में दर्ज हो रही है।

आज, यानी सोमवार 7 जुलाई को, नैनीताल हाईकोर्ट में एक बार फिर उस हत्याकांड की चर्चा हुई ।

जिसने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया था। मुख्य आरोपी पुलकित आर्य ने निचली अदालत के आजीवन कारावास के फैसले को चुनौती दी है।

न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने केस की सुनवाई के बाद कोटद्वार की निचली अदालत से पूरे रिकॉर्ड की मांग की है। अब इस केस की अगली सुनवाई 18 नवंबर को होगी।

30 मई 2025 को कोटद्वार कोर्ट ने एक लंबी सुनवाई के बाद पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित को दोषी ठहराया था।

भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या), 354अ (यौन उत्पीड़न) और 201 (सबूत मिटाना) के तहत तीनों को उम्रकैद की सजा दी गई थी। कोर्ट में 47 गवाह पेश किए गए थे कुछ बोले, कुछ चुप रहे, लेकिन सब मिलकर एक तस्वीर बनाते गए।

हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान पुलकित आर्य के वकील ने कहा कि इस पूरे मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। उनका कहना है कि हत्या का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं, केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं। पुलकित को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।

सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि पुलकित और उसके दोनों साथियों की मोबाइल लोकेशन घटनास्थल पर पाई गई थी।

अंकिता की व्हाट्सएप चैट में उसने स्पष्ट रूप से अपने साथ हो रही मानसिक प्रताड़ना का जिक्र किया था।

इतना ही नहीं, घटना के दिन रिसॉर्ट के सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए गए थे और डीवीआर से भी छेड़छाड़ की गई थी।

अंकिता भंडारी की मौत सिर्फ एक हत्या नहीं, उस सोच की मौत है जो औरतों को ‘सर्विस’ समझती है। उस दिन, जब उसे चीला बैराज में धक्का दिया गया, तब किसी कैमरे ने कुछ नहीं देखा, लेकिन अब फाइलें गवाही दे रही हैं।

यहां सवाल य़ह है कि क्या सबूतों का बंधन उस आवाज़ से बड़ा होता है जो इंसाफ की भीख मांग रही हो? क्या न्याय का रास्ता इतना लंबा होना चाहिए कि सच्चाई की सांस फूलने लगे?

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