ब्रेकिंग न्यूज़
खबर शेयर करे -

उत्तराखंड का लोकपर्व फूल देई अब केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रह गया है।

राज्य के साथ-साथ देश के विभिन्न हिस्सों में निवास कर रहे उत्तराखंड मूल के लोगों ने भी इस पारंपरिक पर्व को बड़े ही उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया।

खास बात यह रही कि केंद्र शासित प्रदेश दमन-दिव में रह रहे उत्तराखंड वासियों ने भी इस पर्व को पूरे उल्लास के साथ मनाते हुए अपनी संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखा।

पर्व के दौरान बच्चों में खासा उत्साह देखने को मिला। पारंपरिक वेशभूषा में सजे बच्चे सुबह-सुबह घर-घर जाकर दहलीज पर फूल चढ़ाते हुए “फूल देई, छम्मा देई, दैणी द्वार भर भकार…” जैसे पारंपरिक गीत गाते नजर आए।

इसके बदले में घरों से उन्हें आशीर्वाद, गुड़, चावल और मिठाइयाँ दी गईं।

दमन-दिव में बसे उत्तराखंड वासियों ने सामूहिक रूप से इस पर्व का आयोजन किया।

कार्यक्रम में महिलाओं और बुजुर्गों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और बच्चों को इस पर्व की परंपरा व महत्व के बारे में बताया।

लोगों ने कहा कि भले ही वे अपने मूल प्रदेश से दूर हों, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं को जीवित रखने के लिए इस तरह के त्योहारों का आयोजन बेहद जरूरी है।

फूल देई पर्व उत्तराखंड में बसंत ऋतु के आगमन और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।

यह पर्व खासतौर पर बच्चों का त्योहार है, जिसमें वे प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करते हुए फूलों के साथ खुशियों का संदेश घर-घर पहुंचाते हैं।

देश के अलग-अलग राज्यों में बसे उत्तराखंड वासियों द्वारा इस पर्व को मनाए जाने से नई पीढ़ी भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रह रही है।

उत्तराखंड सामाजिक सेवा समिति दमन द्वारा  धूमधाम से उत्तराखंड का लोकपर्व फूल देई मनाया गया।

इस आयोजन में एसएस नेगी, दिनेश फुलारा, पीसी जोशी, जीवन बोरा, गोपाल सिंह बोरा, गोपाल सिंह बिष्ट, जांनी जी, मंगल सिंह नेगी, महेंद्र सिंह, बीएस मेहरा , शंकर जोशी, नीलम फुलारा,लता फुलारा, साक्षी हंसिका शिवानी गीतिका साक्षी आरुषि नंदिनी माही डोली योगिता यश सागर देवासी चाहत समेत कई बच्चे मौजूद रहे।

यह भी पढ़ें :  भीमताल क्षेत्र में प्राधिकरण की कार्रवाई पर सवाल, राज्य आंदोलनकारी ने दी उग्र आंदोलन की चेतावनी

You missed

error: Content is protected !!