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नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय के एमएमटीटीसी (मालवीय मिशन शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र) में आयोजित फैकल्टी इंडक्शन कार्यक्रम के अंतर्गत वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. ललित तिवारी ने “जैव विविधता एवं पर्यावरण” विषय पर व्याख्यान दिया।

उन्होंने कहा कि समस्त जीव-जंतु और मानव जैव विविधता का हिस्सा हैं, जबकि उनका अजैविक घटकों से संबंध पर्यावरण का निर्माण करता है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन जैव विविधता के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

प्रो. तिवारी ने कहा कि जैव विविधता केवल विभिन्न जीवों की विविधता नहीं, बल्कि मानव जीवन और अस्तित्व का आधार है। उन्होंने बताया कि विश्वभर में प्रतिदिन लगभग 40 हजार पौधों और जीव-जंतुओं की प्रजातियों का विभिन्न रूपों में उपयोग किया जाता है। जैव विविधता को जेनेटिक, स्पीशीज और इकोसिस्टम विविधता के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जो अल्फा, बीटा और गामा विविधता का निर्माण करती हैं।

उन्होंने कहा कि आज की सबसे बड़ी चुनौती जैव विविधता का सतत उपयोग, समान भागीदारी और संरक्षण सुनिश्चित करना है। जैव विविधता का रसायन विज्ञान, आनुवंशिक संसाधनों, परागण, मृदा निर्माण, पोषक तत्व चक्रण और वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहरा संबंध है। उन्होंने बताया कि विश्व की लगभग 11 प्रतिशत अर्थव्यवस्था जैव विविधता पर आधारित है।

प्रो. तिवारी ने चेतावनी दी कि आक्रामक प्रजातियां, आवासों का विनाश, अत्यधिक दोहन, प्रदूषण और बढ़ती जनसंख्या जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं। वर्तमान में विश्व की लगभग 48,600 प्रजातियां दुर्लभता की श्रेणी में पहुंच रही हैं।

व्याख्यान में उन्होंने उत्तराखंड की समृद्ध जैव विविधता तथा जलवायु, रसायन विज्ञान, जैव-भौगोलिक प्रक्रियाओं, जल विज्ञान, फेनोलॉजी, वाटरशेड और इकोसिस्टम के पारस्परिक संबंधों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंदूकुश पर्वत श्रृंखला की दस प्रमुख नदियां लगभग तीन अरब लोगों के भोजन और ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करती हैं।

प्रो. तिवारी ने बताया कि World Wide Fund for Nature, International Union for Conservation of Nature, रेड डाटा बुक, साइट्स (CITES), वन संरक्षण अधिनियम-1980, जैव विविधता अधिनियम-2002 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-1972 जैसे कानून एवं संस्थाएं संरक्षण कार्यों को आगे बढ़ा रही हैं।

उन्होंने सभी से प्रकृति के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने और प्रतिदिन पर्यावरण संरक्षण के लिए समय देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि ग्रीन मिशन, सतत विकास और संरक्षण में प्रत्येक व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका है तथा हमारा लक्ष्य ऐसा पर्यावरण बनाना होना चाहिए जहां संरक्षण की आवश्यकता ही न पड़े।

कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों से आए 60 सहायक प्राध्यापकों सहित डॉ. प्रजापति, डॉ. सेमवाल, डॉ. बोरा, जतिन एवं अन्य शिक्षाविद उपस्थित रहे।

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