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कुमाऊं में अस्पतालों की घोर लापरवाही, शुद्ध हवा-पानी में जहर घोल रहा बायोमेडिकल वेस्ट, 40 अधिक सरकारी अस्पतालों को नोटिस

पीसीबी की जांच में खुलासा—नैनीताल के 40 सरकारी अस्पतालों को नोटिस, पिथौरागढ़ से लेकर ऊधम सिंह नगर तक कचरा निस्तारण व्यवस्था पर उठे सवाल

हल्द्वानी। कुमाऊं की शांत वादियों, स्वच्छ हवा और निर्मल जल स्रोतों पर अब बायोमेडिकल वेस्ट (जैव चिकित्सा कचरे) का गंभीर खतरा मंडराने लगा है। सरकारी अस्पतालों की लापरवाही के कारण पर्वतीय क्षेत्रों की नदियों, जंगलों और गाड़-गधेरों में खतरनाक मेडिकल कचरा खुले में फेंका जा रहा है। अस्पतालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन जैव चिकित्सा कचरे के वैज्ञानिक और सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था बेहद कमजोर साबित हो रही है।

क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) की जांच में यह सामने आया है कि पहाड़ी क्षेत्रों के कई सरकारी अस्पतालों में बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन के लिए आवश्यक मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है। कई अस्पतालों के पास कचरे के सुरक्षित निस्तारण की समुचित व्यवस्था ही नहीं है, जिससे पर्यावरण और जनस्वास्थ्य दोनों पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

हाईकोर्ट ने दिखाई सख्ती

पिथौरागढ़ में खुले में बायोमेडिकल वेस्ट फेंके जाने के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने राज्य सरकार और उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को एक सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट और जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

सिर्फ पिथौरागढ़ नहीं, पूरे कुमाऊं में लापरवाही

पीसीबी के अनुसार समस्या केवल पिथौरागढ़ तक सीमित नहीं है। नैनीताल, ऊधम सिंह नगर समेत कुमाऊं के अन्य जिलों में भी बायोमेडिकल वेस्ट के निस्तारण में गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। अकेले नैनीताल जिले में ही 40 सरकारी अस्पतालों को नियमों के उल्लंघन पर नोटिस जारी किए गए हैं। वहीं, कई दूरस्थ पर्वतीय अस्पताल अब भी जांच के दायरे से बाहर हैं।

डीप बरियल सिस्टम भी मानकों पर खरा नहीं

पहाड़ी क्षेत्रों में जैव चिकित्सा कचरे के निस्तारण के लिए ‘डीप बरियल’ (गहरे गड्ढों में दबाने) की व्यवस्था अपनाई जाती है, लेकिन इसमें भी भारी लापरवाही सामने आई है। पिथौरागढ़ के महिला और पुरुष सरकारी अस्पतालों में मानकों के अनुरूप डीप बरियल पिट नहीं बनाए जाने पर पीसीबी हाल ही में कार्रवाई कर चुका है।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि डीप बरियल गड्ढे वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप नहीं बनाए जाते, तो बारिश का पानी कचरे में मिलकर भूजल और पेयजल स्रोतों को दूषित कर सकता है। इसके अलावा खुले गड्ढों से दुर्गंध फैलने, आवारा जानवरों के जरिए संक्रमण फैलने और संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।

इन नियमों का पालन है अनिवार्य

बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियम-2016 के तहत सभी अस्पतालों में जैव चिकित्सा कचरे का अलग-अलग श्रेणियों में पृथक्करण अनिवार्य है। इसके लिए पीले, लाल, सफेद और नीले रंग के अलग-अलग डिब्बों का उपयोग किया जाता है।

नियमों के अनुसार डीप बरियल में केवल निर्धारित श्रेणी का जैव चिकित्सा कचरा ही दबाया जा सकता है। प्लास्टिक, कांच, सुई और अन्य शार्प वेस्ट को गड्ढों में दबाना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इनके लिए अलग वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था आवश्यक है।

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर बढ़ा संकट

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते अस्पतालों में बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन की व्यवस्था नहीं सुधारी गई तो इसका सीधा असर नदियों, जंगलों, वन्यजीवों और आम लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ेगा। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब निगाहें राज्य सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट तथा आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं।

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