देहरादून। उत्तराखंड के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने और इलाज के लिए दिल्ली की दौड़ से राहत दिलाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (PMSSY) के तहत ऋषिकेश में एम्स की स्थापना की गई थी।

संस्थान की नींव 2 फरवरी 2004 को रखी गई और वर्ष 2012 में एम्स ऋषिकेश अस्तित्व में आया। शुरुआती वर्षों में ओपीडी, आईपीडी और अन्य चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार हुआ, लेकिन समय बीतने के साथ यह संस्थान स्वास्थ्य सेवाओं से ज्यादा घोटालों को लेकर चर्चा में आने लगा।

चार मुकदमे, दो चार्जशीट—पूर्व निदेशक भी आरोपी

एम्स ऋषिकेश में हुए करोड़ों रुपये के घोटालों को लेकर अब तक सीबीआई चार अलग-अलग मुकदमे दर्ज कर चुकी है। इनमें से दो मामलों में संस्थान के पूर्व निदेशक प्रो. रविकांत आरोपी हैं।

सीबीआई ने दो मामलों में चार्जशीट दाखिल कर दी है, जबकि शेष दो मामलों में जांच अभी जारी है।

स्वीपिंग मशीन घोटाला: 24 घंटे में दम तोड़ गई ढाई करोड़ की मशीन

एम्स में हुए तमाम घोटालों में स्वीपिंग मशीन खरीद घोटाला सबसे चौंकाने वाला साबित हुआ।

करीब 2.40 करोड़ रुपये की लागत से निविदा मूल्यांकन समिति (TEC) ने एक ऐसी मशीन खरीदी, जो पहले से छह माह पुरानी थी। मशीन के अधिकतर पुर्जे बदलकर नए लगाए गए थे।

यह मशीन बिचौलिये महेंद्र उर्फ नन्हे के माध्यम से विदेश से मंगाई गई, जिसे तकनीकी जानकारी तक नहीं थी।

टेंडर शर्तों के अनुसार मशीन की पांच साल की गारंटी होनी चाहिए थी, लेकिन मशीन महज 24 घंटे चलने के बाद ही जवाब दे गई।

आपत्तियों को किया गया नजरअंदाज

टेंडर से बाहर की गई मैसर्स यूरेका फोर्ब्स लिमिटेड (कोलकाता) और मैसर्स आयोटा इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन (हरियाणा) ने खरीद प्रक्रिया पर आपत्ति जताते हुए संस्थान से पत्राचार किया, लेकिन उनकी आपत्तियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।

जांच में यह भी सामने आया कि वर्क ऑर्डर जारी होने से पहले ही मशीन मंगवा ली गई थी और बाद में औपचारिकता निभाने के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी की गई।

अन्य खरीद में भी करोड़ों का खेल

एम्स ऋषिकेश में उपकरणों की खरीद में अनियमितताओं को लेकर सीबीआई ने अगस्त 2023 में एक और मुकदमा दर्ज किया।

8 जनवरी 2019 से 22 फरवरी 2019 के बीच उन्नत वेसल सीलिंग उपकरणों की खरीद प्रक्रिया कराई गई, जिसमें माइक्रोबायोलॉजी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर बलराम जी ओमर को खरीद अधिकारी और समन्वयक बनाया गया।

जहां पहले यही उपकरण 19.90 लाख रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदे गए थे, वहीं बाद में 54 लाख रुपये प्रति यूनिट की दर से सात उपकरण खरीदकर 3.83 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए।

जांच में यह भी खुलासा हुआ कि इन उपकरणों का तीन वर्षों तक कोई उपयोग नहीं किया गया। इस सौदे में 6.57 करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले की पुष्टि हुई।

कोरोनरी केयर यूनिट में 2.73 करोड़ का घपला

एम्स में कोरोनरी केयर यूनिट (CCU) की स्थापना में भी 2.73 करोड़ रुपये के घोटाले का मामला सामने आया।

पूर्व निदेशक डा. रविकांत, तत्कालीन एडिशनल प्रोफेसर रेडिएशन ऑन्कोलॉजी राजेश पसरीचा और तत्कालीन स्टोर कीपर रूप सिंह ने ठेकेदार की मिलीभगत से यह घोटाला अंजाम दिया।

इस मामले में घोटाले से जुड़े दस्तावेज तक गायब कर दिए गए।

एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB), सीबीआई ने 26 सितंबर 2025 को तीनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया।

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