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नैनीताल। नैनीताल से हाईकोर्ट को हल्द्वानी शिफ्ट किए जाने के प्रस्ताव को लेकर विरोध के स्वर लगातार तेज होते जा रहे हैं। हाईकोर्ट के अधिवक्ताओं के बाद अब जिला न्यायालय नैनीताल के अधिवक्ता भी खुलकर विरोध में सामने आ गए हैं।

इसी क्रम में गुरुवार को प्रताप भैया सभागार में जिला बार एसोसिएशन की ओर से आमसभा आयोजित की गई। सभा में अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट को नैनीताल से अन्यत्र स्थानांतरित किए जाने के विचार को पहाड़ और नैनीताल के हितों के खिलाफ बताते हुए इसका पुरजोर विरोध किया।

आमसभा में वक्ताओं ने कहा कि नैनीताल लंबे समय से न्यायिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। ऐसे में हाईकोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित किए जाने से न केवल नैनीताल की पहचान प्रभावित होगी, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों पर भी इसका व्यापक असर पड़ सकता है। अधिवक्ताओं ने कहा कि पहाड़ों से जुड़े संस्थानों को धीरे-धीरे मैदानी क्षेत्रों में स्थानांतरित किए जाने से पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार और आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होंगी तथा पलायन की समस्या और गंभीर हो सकती है।

सभा को संबोधित करते हुए पूर्व अध्यक्ष ओंकार गोस्वामी ने कहा कि हाईकोर्ट शिफ्टिंग के विरोध में आंदोलन शुरू करने से पहले सभी सहयोगी अधिवक्ताओं और बार एसोसिएशनों से व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामूहिक चर्चा के बाद ही आगे की रणनीति तय की जाए, ताकि आंदोलन को प्रभावी और संगठित तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।

पूर्व अध्यक्ष नीरज साह ने हाईकोर्ट शिफ्टिंग के विरोध को कानूनी तरीके से आगे बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इस मामले में भावनात्मक विरोध के साथ-साथ कानूनी पहलुओं को भी मजबूती से सामने रखा जाना जरूरी है। वहीं पूर्व अध्यक्ष मनीष मोहन जोशी ने भी प्रस्तावित शिफ्टिंग का विरोध करते हुए जरूरत पड़ने पर आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी।

उप सचिव नीरज गोस्वामी ने उत्तराखंड सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि राज्य का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा पर्वतीय है, जबकि बड़े संस्थानों का अधिकांश केंद्रीकरण राज्य के मैदानी क्षेत्र के करीब 15 प्रतिशत हिस्से में होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि हाईकोर्ट को भी पहाड़ से तराई क्षेत्र में ले जाने की तैयारी की जाती है तो इसका सीधा असर पर्वतीय क्षेत्रों पर पड़ेगा और इससे पहाड़ से पलायन को बढ़ावा मिलने की आशंका है।

पूर्व अध्यक्ष भगवत प्रसाद ने कहा कि उन्होंने अपने जीवनकाल में किसी स्थापित हाईकोर्ट को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होते नहीं देखा। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर स्थापित हाईकोर्ट को शिफ्ट करने की आवश्यकता क्यों महसूस की जा रही है, यह समझ से परे है।

सुशील शर्मा ने भी हाईकोर्ट शिफ्टिंग को पहाड़ विरोधी कदम बताते हुए इसका विरोध किया। इसके अलावा तरुण चंद्रा, मनीष कांडपाल, अशोक मौलेखी, सोहन तिवारी, रचित तिवारी, पूर्व सचिव भानू प्रताप सिंह मौनी, नवीन पंत, संध्या शर्मा, कैलाश जोशी सहित अन्य अधिवक्ताओं ने अपने विचार रखते हुए हाईकोर्ट को नैनीताल से स्थानांतरित किए जाने का पुरजोर विरोध किया।

सभा के अंत में जिला बार एसोसिएशन अध्यक्ष अरुण बिष्ट ने कहा कि अधिवक्ता पहाड़ के हितों के साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट शिफ्टिंग के विरोध में आगे की रणनीति सभी बार एसोसिएशनों से वार्ता के बाद तय की जाएगी। उन्होंने संकेत दिया कि आवश्यकता पड़ने पर अधिवक्ता आंदोलन को व्यापक रूप दे सकते हैं।

वहीं सचिव संजय सुयाल ने कहा कि हाईकोर्ट के शिफ्ट होने से पहाड़ से पलायन की समस्या और गंभीर होने की आशंका है। उन्होंने कहा कि न्यायिक संस्थानों की मौजूदगी पहाड़ के लिए केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं, बल्कि रोजगार, कारोबार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी हुई है।

आमसभा में बार एसोसिएशन अध्यक्ष अरुण बिष्ट, उपाध्यक्ष कमल चिलवाल, सचिव संजय सुयाल, उप सचिव नीरज गोस्वामी के अलावा कार्यकारिणी सदस्य निर्मल कुमार, बिलाल अहमद, तारा आर्या, सरिता बिष्ट, मान सिंह बिष्ट, सुनील बिष्ट, हेमा शर्मा, पूजा साह, किरण आर्या, कमला अधिकारी, दीपक दत्त पांडे, मो. तय्यब, अब्दुल समीर, हरेंद्र सिंह, अनिल वाल्मीकि, बीके सांगुड़ी, पवन खनायत समेत बड़ी संख्या में अधिवक्ता मौजूद रहे।

अधिवक्ताओं के इस सामूहिक विरोध के बाद हाईकोर्ट शिफ्टिंग का मुद्दा एक बार फिर गरमाता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में जिला बार एसोसिएशन की अन्य बार एसोसिएशनों के साथ होने वाली वार्ता और उसके बाद तय होने वाली रणनीति पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

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