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खड़ी और बैठकी होली : अनोखी है परपंरा, यहां आंगन-आंगन जाकर गाते हैं होली 

उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में मनाई जाने वाली होली देशभर में अपनी अनूठी पहचान रखती है। यहां होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत, लोकजीवन और सामूहिक उत्सव का अद्भुत संगम है। पहाड़ों में होली का पर्व बसंत पंचमी से ही शुरू हो जाता है, इसलिए इसे दो महीने तक चलने वाला पर्व भी कहा जाता है।

कुमाऊं की होली मुख्य रूप से दो रूपों में देखने को मिलती है—बैठकी होली और खड़ी होली। बैठकी होली को नागर होली भी कहा जाता है, जिसमें शास्त्रीय रागों पर आधारित गायन होता है। अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और हल्द्वानी में इन दिनों बैठकी होली की विशेष धूम देखने को मिलती है।

बैठकी होली की महफिलें शास्त्रीय संगीत की बैठकों की तरह सजती हैं, जहां गायक और श्रोता के बीच कोई दूरी नहीं होती। झिंझोटी, जोगिया और काफी जैसे रागों में गाई जाने वाली यह होली पीढ़ियों से श्रुति परंपरा के जरिए आगे बढ़ रही है। इतिहासकारों के अनुसार 16वीं सदी में चंद वंश के शासकों के समय इस परंपरा को राजाश्रय मिला, जिसे बाद में दरबारी संगीतज्ञों ने और समृद्ध किया।

वहीं खड़ी होली ग्रामीण जीवन की सामूहिक अभिव्यक्ति है, जिसमें झोड़ा-चांचरी जैसे लोकनृत्य के साथ होली गाई जाती है। लोहाघाट, चंपावत, पिथौरागढ़ और नैनीताल क्षेत्रों में इसकी खास रौनक रहती है।

खड़ी होली में होल्यार गोल घेरे में खड़े होकर हुड़का, ढोल, नगाड़ा और रणसिंगा की थाप पर गीत गाते और नृत्य करते हैं। इस दौरान घरों में मेहमाननवाजी के रूप में गुड़, तिल और घी से बनी पारंपरिक मिठाई परोसी जाती है।

कुमाऊं में होली को ‘छरणी’ या ‘छरण’ भी कहा जाता है। पहले सीमल जैसे फूलों से प्राकृतिक रंग बनाए जाते थे, लेकिन अब उनकी जगह बाजार के रंगों ने ले ली है।

कुल मिलाकर कुमाऊं की होली रंग, राग और रिश्तों का ऐसा उत्सव है, जिसमें पूरी पहाड़ी संस्कृति की आत्मा झलकती है।

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