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 आजादी के 75 वर्ष बाद भी ग्रामीण बीमार बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को डोली में ले जाने को मजबूर

राज्य स्थापना के  24 वर्षों में 6 बार चुनी गई सरकारों को मंगोली गांव के ग्रामीणों का नहीं दिखाई देता दर्द

रिपोर्टर गुड्डू सिंह ठठोला

ऊत्तराखण्ड के विश्व प्रसिद्ध नैनीताल के समीप आजादी के 71 वर्ष बाद आज भी ग्रामीण अपने बीमारों, बुजुर्गों, गर्भवतियों और नवजातों को डोलियों में ले जाते हैं। ये ग्रामीण, अब टेक्नॉलिजी का फायदा उठाकर, मोबाइल से वीडियो बनाकर राज्य सरकार तक अपनी समस्या पहुंचाना चाहते हैं।
नैनीताल से कालाढूंगी होते हुए देहरादून जाने वाले राजकीय राजमार्ग में महज 17 किलोमीटर दूर मंगोली गांव बसा है।

इसके समीप ही भेवा गांव है जहां के मान सिंह ने अपनी समस्याओं को दर्शाते हुए एक वीडियो बनाया हैं साथ ही इस समस्या को विधायक सरिता आर्या को भी अवगत कराया गया था पर स्थिति जैसी की तैसी बनी हुई हैं।

अभी तक इस मार्ग के लिए कोई भी आगे नहीं आया उबर खाबर मार्ग होने से ग्रामीणों को दिक्कतो का सामना करना पड़ रहा है इन्होंने सोशियल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर भी गांव की पखडण्डी वाले उबड़ खाबड़ रास्ते को दर्शाया है।

उन्होंने इन वीडियो के माध्यम से उत्तराखंड सरकार से आगे अपने गांव के दुख को रखा है। उनका कहना है कि गांव का एकमात्र पैदल पखडण्डी मार्ग है।

जिसे सरकार अपने संसाधनों से मोटर मार्ग बनाए। सड़क होने के बाद गांव वालो की काफ़ी हद तक परेशानियां खत्म हो जाएंगी। उन्होंने बताया है कि मुख्य मार्ग(राज.राजमार्ग)से उनका गांव 3 किमी नीचे की तरफ है।

ये पूरा रास्ता जंगल से होते हुए गुजरता है और यहां जंगली जानवरों का खतरा भी बना रहता है। इस रास्ते में स्कूल आने जाने वाले बच्चों, बुजुर्गों, बीमारों, गर्भवतियों और नवजातों समेत रोजमर्रा के सामान को लाने और ले जाने में दिखकतें आती हैं।

गांव के युवाओं को असहाय जरूरतमंदों को कुर्सी या चारपाई पर रखकर सफर करना पड़ता है। यहां तक बीमार मवेशियों को भी डंडों की डोली बनाकर ले जाना पड़ता है।

अब ये ग्रामीण राहत के लिए आस लगाकर सरकार की तरफ देख रहे हैं। पहाड़ी राज्य की स्थापना के  24 वर्षों में 6 बार चुनी गई अलग अलग सरकार को अबतक मंगोली गांव का ये दर्द नहीं दिख सका है।

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