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उत्तराखंड में मौसम का मिजाज बदला हुआ है और पहाड़ से मैदान तक बादलों का डेरा है।

ऊंचाई वाले इलाकों में गरज-चमक के साथ बौछारें भी पड़ रही हैं।

मैदानी क्षेत्रों में धूप और बादलों की आंख-मिचौनी चलती रही। मौसम विभाग के अनुसार, आज भी पर्वतीय क्षेत्रों में आकाशीय बिजली चमकने और गरज-चमक के साथ बौछारें पड़ने को लेकर अलर्ट जारी किया गया है।

निचले इलाकों में आंशिक बादल छाने से लेकर हल्की वर्षा की संभावना है।

उत्तराखंड में मौसम ने एक बार फिर करवट ले ली है। प्रदेश के तीन हजार मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में लगातार बारिश और बर्फबारी का दौर जारी है।

मौसम विभाग ने 10 अप्रैल तक उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिलों के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हल्की बारिश और बर्फबारी की संभावना जताई है।

मौसम विभाग ने 4 अप्रैल को देहरादून, टिहरी, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर और पिथौरागढ़ में ओलावृष्टि, तेज आंधी और बारिश को लेकर ऑरेंज अलर्ट जारी किया था। वहीं 5 से 8 अप्रैल तक तेज हवाओं और ओलावृष्टि की आशंका को देखते हुए येलो अलर्ट घोषित किया गया है।

बदलते मौसम का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ा है। तेज हवाओं, मूसलाधार बारिश और ओलावृष्टि से कई इलाकों में खड़ी फसलें बर्बाद हो गई हैं। खासतौर पर नगदी फसलें जैसे धनिया, प्याज और मटर को भारी नुकसान पहुंचा है। किसानों को इससे आर्थिक झटका लगा है।

आंकड़ों के अनुसार, मार्च महीने में प्रदेश में सामान्य से 11 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई। औसतन 58 मिलीमीटर वर्षा हुई, जबकि टिहरी जिले में सबसे अधिक 100 एमएम बारिश रिकॉर्ड की गई। वहीं ऊधम सिंह नगर में सबसे कम 12 एमएम बारिश हुई। राजधानी देहरादून में भी मार्च के दौरान सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई और तापमान सामान्य से नीचे बना रहा।

मौसम की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन अलर्ट मोड पर है। पर्वतीय क्षेत्रों में ट्रेकिंग गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगाने के निर्देश जारी किए गए हैं।

संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ा दी गई है और किसी भी आपदा की स्थिति से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन की टीमें हाई अलर्ट पर हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम में यह असामान्य बदलाव जलवायु परिवर्तन का संकेत है। पर्यावरण विशेषज्ञ प्रोफेसर एस.पी. सती के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम चक्र प्रभावित हो रहा है।

अब बर्फबारी का समय बदल रहा है और मानसून का पैटर्न भी असंतुलित होता जा रहा है, जो भविष्य में और गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

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