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भीमताल। जंगलों में लगातार बढ़ रही आग की घटनाओं को लेकर पर्यावरण प्रेमी चंदन नयाल ने चिंता जताई है।

उन्होंने कहा कि पिछले 15 वर्षों से पहाड़ों में एक ही दृश्य देखने को मिल रहा है—जंगल धधक रहे हैं और वन विभाग के पास आग बुझाने के नाम पर आज भी पारंपरिक ‘हरी टहनियों’ का ही सहारा है।

चंदन नयाल ने कहा कि यह विडंबना है कि तकनीक के इस आधुनिक दौर में भी जंगलों की आग बुझाने के लिए प्रभावी संसाधनों और आधुनिक उपकरणों का अभाव बना हुआ है।

हर वर्ष ‘फायर सीजन’ के नाम पर करोड़ों रुपये का बजट आता है और कागजों में बड़े-बड़े आंकड़े दर्ज होते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति बेहद कमजोर दिखाई देती है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब सुरक्षा के लिए पुलिस की तर्ज पर एक समर्पित विभाग मौजूद है, तो फिर हर साल जंगल आग की भेंट क्यों चढ़ रहे हैं और करोड़ों का बजट आखिर कहां खर्च हो रहा है।

उन्होंने कहा कि जंगलों का जलना केवल पेड़ों का नुकसान नहीं है, बल्कि इससे जैव विविधता, वन्य जीव, पक्षी और छोटे-छोटे जीवों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाता है।

मार्च महीने की शुरुआत के साथ ही पहाड़ों में जंगलों में आग की घटनाएं सामने आने लगी हैं, जबकि अभी चीड़ की पत्तियों (पिरोल) का गिरना भी पूरी तरह शुरू नहीं हुआ है।

चंदन नयाल ने कहा कि राजधानी में बैठकों और सेमिनारों के जरिए जंगलों को बचाने की योजनाएं बनाई जाती हैं, लेकिन ग्राउंड स्तर पर हालात आज भी वर्षों पुराने जैसे ही बने हुए हैं। आधुनिक उपकरणों और ठोस कार्ययोजना के अभाव में वन रक्षक और फायर वॉचर भी बेबस नजर आते हैं।

उन्होंने कहा कि जंगल हमारे जीवन का आधार हैं, क्योंकि हमारी हवा, पानी और भोजन सीधे तौर पर इन्हीं पर निर्भर करते हैं। ऐसे में केवल विभाग को दोष देने के बजाय समाज को भी आगे आकर जनभागीदारी बढ़ानी होगी और जवाबदेही तय करनी होगी।

उन्होंने कहा कि जब तक प्रशासन की मंशा और जनता की भागीदारी का सही तालमेल नहीं होगा, तब तक देवभूमि के जंगल इसी तरह आग की भेंट चढ़ते रहेंगे।

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