महर्षि वाल्मीकि प्रकटोत्सव में धार्मिक झांकियों, अखाड़ों और नासिक बैंड की प्रस्तुतियों ने मोहा मन, श्रद्धालुओं ने महर्षि वाल्मीकि के आदर्शों पर चलने का लिया संकल्प

रिपोर्ट :  गुड्डू सिंह ठठोला

नैनीताल। सरोवर नगरी नैनीताल में महर्षि वाल्मीकि प्रकटोत्सव श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर वाल्मीकि मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई, जिसके बाद भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में शामिल विभिन्न धार्मिक झांकियों, अखाड़ों और नासिक बैंड की आकर्षक प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। नगर में जगह-जगह लोगों ने शोभायात्रा का स्वागत करते हुए पुष्पवर्षा की। आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर महर्षि वाल्मीकि के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

शोभायात्रा के दौरान पूरा वातावरण भक्तिमय नजर आया। श्रद्धालु धार्मिक उत्साह के साथ शोभायात्रा में शामिल हुए और महर्षि वाल्मीकि के जयकारों से माहौल गुंजायमान रहा। शोभायात्रा में काली अखाड़ा, शिव अखाड़ा और नासिक बैंड की प्रस्तुतियां विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं। अखाड़ों के कलाकारों ने अपने प्रदर्शन से लोगों को प्रभावित किया, वहीं बैंड की धुनों ने आयोजन की भव्यता में चार चांद लगा दिए।

शोभायात्रा में बग्गियों पर सवार भारत माता, भगवान गणेश, काली तांडव, महर्षि वाल्मीकि डोला, हनुमान जी, महर्षि वाल्मीकि, नौ दुर्गा, राम दरबार और राधा-कृष्ण की झांकियों ने श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया। इन झांकियों के माध्यम से धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का सुंदर चित्रण किया गया। जगह-जगह लोगों ने पुष्पवर्षा कर शोभायात्रा का स्वागत किया।

इस अवसर पर दिनेश कटियार ने महर्षि वाल्मीकि के जीवन, उनके विचारों और भारतीय संस्कृति में उनके योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकि के आदर्श आज भी समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनके विचारों को जीवन में अपनाकर समाज में आपसी भाईचारे, एकता और सद्भाव को मजबूत किया जा सकता है।

उन्होंने रामायण से जुड़ी प्रसंग परंपरा का उल्लेख करते हुए बताया कि अश्वमेध यज्ञ के दौरान लव-कुश ने भगवान हनुमान और राम सेना को मूर्छित कर दिया था। उन्होंने पंजाब के धूनी साहिब में मौजूद बरगद के पेड़ से जुड़ी मान्यता का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, जब भगवान राम वहां पहुंचे तो लव-कुश ने बाण चलाए, लेकिन वे उनके चरणों की ओर जाने लगे। इसी दौरान महर्षि वाल्मीकि ने प्रकट होकर लव-कुश को बताया कि भगवान राम उनके पिता हैं। उन्होंने इस प्रसंग को सनातन संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा महत्वपूर्ण उदाहरण बताया।

दिनेश कटियार ने कहा कि ब्रिटिश शासनकाल से ही महर्षि वाल्मीकि जयंती मनाने की परंपरा चली आ रही है। उस समय वाल्मीकि समाज को शोभायात्रा निकालने के लिए अंग्रेज अधिकारियों से अनुमति लेनी पड़ती थी। उन्होंने कहा कि आज भी वाल्मीकि समाज अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए सनातन संस्कृति से जुड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि मंदिर से निकाली गई शोभायात्रा का समापन आश्रम में किया जाएगा।

महर्षि वाल्मीकि को भारतीय साहित्य में आदिकवि के रूप में सम्मान प्राप्त है। उनके द्वारा रचित रामायण भारतीय संस्कृति, साहित्य और आध्यात्मिक परंपरा की अमूल्य धरोहर मानी जाती है। महर्षि वाल्मीकि प्रकटोत्सव के अवसर पर श्रद्धालुओं ने उनके आदर्शों को आत्मसात करने, सामाजिक एकता को मजबूत बनाने और आपसी सद्भाव बनाए रखने का संकल्प लिया।

शोभायात्रा के उपरांत मंदिर में पूजा-अर्चना की गई और श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। पूरे आयोजन के दौरान धार्मिक उत्साह और उल्लास का माहौल बना रहा। महर्षि वाल्मीकि प्रकटोत्सव ने एक बार फिर समाज को उनकी शिक्षाओं, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समरसता के संदेश से जोड़ने का कार्य किया।

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