शराब की लत ने पहाड़ के कई घरों में बढ़ाई कलह, हिंसा और आर्थिक संकट—महिलाओं और मासूम बच्चों का भविष्य सबसे ज्यादा प्रभावित
हल्द्वानी/कुमाऊं। उत्तराखंड को देवभूमि के साथ-साथ शांत, सरल और मेहनतकश लोगों की धरती के रूप में जाना जाता है, लेकिन शराब का बढ़ता कारोबार और नशे की बढ़ती प्रवृत्ति पहाड़ के सामाजिक ताने-बाने के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। गांव से लेकर शहर तक शराब के नशे में मारपीट, घरेलू विवाद, सड़क हादसे और कई बार गंभीर अपराधों की घटनाएं सामने आ रही हैं। इसका सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ रहा है, जिनकी आर्थिक जिम्मेदारी संभालने वाला व्यक्ति शराब की गिरफ्त में आकर परिवार से दूर होता जा रहा है।
पहाड़ों में बड़ी संख्या में परिवार आज भी मजदूरी, खेती-बाड़ी और छोटे-मोटे रोजगार के सहारे अपना जीवन चलाते हैं। ऐसे परिवारों में यदि कमाने वाला व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा शराब पर खर्च करने लगे तो उसका सीधा असर घर के राशन, बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जरूरतों पर पड़ता है। कई मामलों में शराब पीकर घर लौटने के बाद पति-पत्नी के बीच विवाद इतना बढ़ जाता है कि बात मारपीट तक पहुंच जाती है।
शराब के नशे में घरेलू हिंसा बनी गंभीर चिंता
शराब के कारण घरेलू हिंसा की घटनाएं समाज के सामने गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। नशे में व्यक्ति अपना आपा खोकर पत्नी और बच्चों के साथ मारपीट करने पर उतारू हो जाता है। कई महिलाएं वर्षों तक ऐसी परिस्थितियों में जीवन बिताने को मजबूर होती हैं।
कुमाऊं क्षेत्र में हाल ही में ओखलकांडा क्षेत्र में शराब के नशे में एक व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी के साथ मारपीट किए जाने की घटना ने लोगों को झकझोर दिया। गंभीर रूप से घायल महिला की मौत हो गई। इस घटना के बाद चार बच्चों के सिर से मां का साया उठ गया। यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि शराब की वजह से टूटते परिवारों की भयावह तस्वीर भी सामने रखती है।
शराब से बर्बाद हो रहे परिवार
शराब की वजह से कई परिवार आर्थिक और सामाजिक संकट में पहुंच गए हैं। कहीं पति की शराब की लत ने परिवार को कर्ज में डुबो दिया तो कहीं नशे में वाहन चलाने के कारण हादसों में लोगों की जान चली गई। ऐसे हादसों के बाद पीछे रह जाने वाली महिलाएं और बच्चे अचानक बेसहारा हो जाते हैं।
कई महिलाओं के सामने बच्चों की परवरिश, शिक्षा और परिवार का खर्च चलाने की चुनौती खड़ी हो जाती है। मासूम बच्चों से उनका बचपन छिन जाता है और उन्हें कम उम्र में ही परिवार की परेशानियों को समझना पड़ता है।
मासूम बच्चों के भविष्य पर भी सवाल
शराब का असर केवल शराब पीने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी सबसे बड़ी कीमत परिवार के बच्चे चुकाते हैं। जिस घर में रोज शराब को लेकर विवाद और मारपीट होती है, वहां बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास पर भी असर पड़ सकता है।
कुछ दिन पहले हल्द्वानी के मुखानी क्षेत्र में दिनदहाड़े एक महिला के छोटे बच्चे को गोद में लेकर सड़क पर शराब के नशे में हंगामा करने का मामला भी सामने आया था। इस तरह की तस्वीरें समाज को सोचने पर मजबूर करती हैं कि नशे की गिरफ्त में फंसे माता-पिता के व्यवहार का बच्चों के भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
राजस्व बनाम सामाजिक नुकसान का सवाल
सरकार को शराब से अच्छा खासा राजस्व प्राप्त होता है। शराब की बिक्री से मिलने वाला राजस्व सरकार की आय का एक स्रोत है, लेकिन इसके साथ ही शराब से पैदा होने वाली सामाजिक समस्याओं की कीमत भी समाज को चुकानी पड़ती है।
सवाल यह है कि शराब से मिलने वाले राजस्व के मुकाबले घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाओं, अपराध, स्वास्थ्य समस्याओं और परिवारों के टूटने से होने वाला सामाजिक नुकसान कितना बड़ा है? क्या शराब की दुकानों और बारों की संख्या तथा उनके संचालन पर सामाजिक प्रभावों को भी उतनी ही गंभीरता से देखा जा रहा है?
महिलाओं की लड़ाई सिर्फ शराब के खिलाफ नहीं, परिवार बचाने की भी है
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाओं ने पहले भी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई है। शराब के खिलाफ महिलाओं के आंदोलनों का इतिहास भी प्रदेश में पुराना रहा है। आज एक बार फिर जरूरत महसूस हो रही है कि शराब की बिक्री और सेवन से जुड़े सामाजिक प्रभावों पर व्यापक चर्चा हो।
जरूरत केवल शराब की दुकानों पर कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि नशा मुक्ति, जनजागरूकता, परिवार परामर्श और युवाओं को रोजगार एवं सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ने की भी है। गांवों में महिलाओं और ग्राम सभाओं की भागीदारी से नशे के खिलाफ मजबूत अभियान चलाया जा सकता है।
सरकार और समाज दोनों को लेना होगा संज्ञान
शराब की समस्या को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह स्वास्थ्य, परिवार, महिला सुरक्षा, बच्चों के भविष्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा व्यापक सामाजिक मुद्दा है।
सरकार को शराब की बिक्री से मिलने वाले राजस्व के साथ-साथ उससे उत्पन्न सामाजिक नुकसान का भी आकलन करना चाहिए। शराब की दुकानों के लाइसेंस, बिक्री के समय, अवैध बिक्री और गांवों में होने वाली अनधिकृत शराब बिक्री पर प्रभावी निगरानी जरूरी है।
वहीं समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जब तक शराब को सामाजिक स्वीकार्यता मिलती रहेगी, तब तक इस समस्या पर पूरी तरह अंकुश लगाना मुश्किल होगा।
पहाड़ की पहचान मेहनत, संघर्ष और संस्कृति से है, शराब से नहीं। आज जरूरत इस बात की है कि पहाड़ के घरों को नशे की आग से बचाया जाए, महिलाओं को सुरक्षित वातावरण मिले और बच्चों को ऐसा भविष्य दिया जाए जहां उन्हें शराब के नशे में होने वाले झगड़े और हिंसा के बीच अपना बचपन न बिताना पड़े।
शराब से मिलने वाला राजस्व भले ही सरकारी खजाने को मजबूत करे, लेकिन अगर उसकी कीमत उजड़ते परिवार, अनाथ होते बच्चे और असहाय होती महिलाएं चुका रही हैं तो इस पूरे विषय पर सरकार और समाज—दोनों को गंभीरता से आत्ममंथन करने की जरूरत है।










