हरियाली, अच्छी फसल, पारिवारिक सुख-समृद्धि और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है हरेला पर्व

नैनीताल। उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति में हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और कृषि संस्कृति के प्रति आस्था, समर्पण और सामाजिक समरसता का प्रतीक है।

यह पर्व हरियाली, नई ऊर्जा और जीवन के नवसृजन का संदेश देता है। मानसून के आगमन के साथ मनाया जाने वाला हरेला लोगों को प्रकृति से जोड़ने, पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने और सतत विकास का संकल्प लेने के लिए प्रेरित करता है।

‘हरेला’ का शाब्दिक अर्थ है “हरियाली” या “हरे रंग का दिन”। यह पर्व अच्छी फसल, पर्यावरण संरक्षण और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के साथ मनाया जाता है। उत्तराखंड में हरेला वर्ष में तीन बार मनाया जाता है। पहला चैत्र माह में, दूसरा श्रावण माह में और तीसरा आश्विन माह में। चैत्र का हरेला गर्मी, श्रावण का हरेला वर्षा तथा आश्विन का हरेला सर्दी के आगमन का संकेत माना जाता है। इनमें श्रावण मास का हरेला सबसे अधिक सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है।

श्रावण हरेला की शुरुआत सावन लगने से नौ दिन पहले होती है। इस दौरान घरों में पाँच या सात प्रकार के अनाज जैसे जौ, गेहूं, मक्का, उड़द, गहत, भट्ट, धान और सरसों आदि बोए जाते हैं। दसवें दिन, यानी सावन के प्रथम दिन, इन अंकुरित पौधों को हरेला के रूप में काटकर भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीगणेश की पूजा की जाती है। इसके बाद हरेला कुलदेवता को अर्पित किया जाता है और परिवार के बुजुर्ग बच्चों व परिजनों के सिर पर हरेला रखकर दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार सावन के प्रथम दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। एक अन्य कथा के अनुसार प्राचीन काल में भीषण सूखा पड़ने पर लोगों ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर शिव ने वर्षा कराई, जिससे धरती पर हरियाली लौट आई। तभी से हरेला को भगवान शिव के आशीर्वाद और समृद्धि के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर लोग मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की प्रतिमाएँ, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘डीकारे’ कहा जाता है, बनाकर पूजा करते हैं।

हरेला पर्व का सबसे महत्वपूर्ण संदेश पर्यावरण संरक्षण है। इस अवसर पर बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाए जाते हैं। खेतों, बगीचों और जंगलों में पौधे लगाए जाते हैं ताकि हरियाली बढ़े, मिट्टी का कटाव रुके, जल संरक्षण को बढ़ावा मिले और भूजल स्तर में सुधार हो। जलवायु परिवर्तन के दौर में यह पर्व हमें याद दिलाता है कि “यदि प्रकृति स्वस्थ है, तो मानव जीवन भी स्वस्थ रहेगा।” पेड़ वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए हरेला आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और हरित पर्यावरण का संकल्प भी है।

हरेला उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का भी अभिन्न हिस्सा है। यह पर्व प्रकृति, कृषि, परिवार और समाज के बीच गहरे संबंधों को मजबूत करता है तथा सामूहिक रूप से पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा देता है।

हरेला पर्व पर बुजुर्गों द्वारा दिया जाने वाला पारंपरिक आशीर्वाद आज भी लोकजीवन में उतनी ही श्रद्धा से बोला जाता है—

“जी रया, जागि रया।

दूबक जस जड़ हैजो, पात जस पौल हैजो।

स्यालक जस बल, वन त्राण हैजो।

हिमालय में ह्यूं छन तक, गंगा में पानी छन तक, हरेला त्यार माने रया।”

अर्थात् दीर्घायु रहो, सदैव जागरूक रहो, दूब की तरह मजबूत जड़ें हों, पत्तों की तरह जीवन में विस्तार हो, वन्य जीवों जैसी शक्ति मिले और जब तक हिमालय में बर्फ तथा गंगा में जल रहेगा, तब तक हरेला पर्व की परंपरा यूँ ही जीवित रहे।

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