नैनीताल में बी डी पांडे अस्पताल में आशा कार्यकर्ताओं ने प्रमुख चिकित्सक अधिकारी को ज्ञापन सौंपा।

रिपोर्टर गुड्डू सिंह ठठोला

नैनीताल। बीडी पांडे जिला अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं और विशेष रूप से अल्ट्रासाउंड व्यवस्था को लेकर आशा कार्यकर्ताओं का विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा है। गुरुवार को उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन से जुड़ी आशा कार्यकर्ताओं ने अस्पताल पहुंचकर गर्भवती महिलाओं को अल्ट्रासाउंड कराने में हो रही परेशानियों को लेकर विरोध जताया और प्रमुख चिकित्सा अधिकारी को ज्ञापन सौंपा।

आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिले के दूर-दराज और ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाएं अल्ट्रासाउंड कराने के लिए जिला अस्पताल पहुंचती हैं, लेकिन अस्पताल में सीमित व्यवस्था होने के कारण उन्हें घंटों इंतजार करना पड़ता है। कई महिलाओं को लंबी कतारों और निर्धारित समय की समस्या के चलते परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन की अध्यक्ष कमला कुंजवाल ने आरोप लगाया कि जिला अस्पताल में केवल एक अल्ट्रासाउंड मशीन होने के कारण गर्भवती महिलाओं के साथ-साथ अन्य मरीजों की भी लंबी कतार लगी रहती है। उन्होंने कहा कि गर्भवती महिलाओं को दूर-दराज के क्षेत्रों से अस्पताल पहुंचना पड़ता है और कई बार उन्हें छोटे बच्चों व परिजनों के साथ घंटों इंतजार करना पड़ता है।

गर्भवती महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था की मांग

आशा कार्यकर्ताओं ने प्रदेश सरकार और स्वास्थ्य विभाग से मांग की है कि गर्भवती महिलाओं के लिए अल्ट्रासाउंड की अलग और प्राथमिक व्यवस्था की जाए, ताकि उन्हें सामान्य मरीजों की लंबी कतार में इंतजार न करना पड़े। उनका कहना है कि गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच बेहद महत्वपूर्ण होती है और अल्ट्रासाउंड में देरी या बार-बार अस्पताल आने की मजबूरी महिलाओं के लिए अतिरिक्त परेशानी पैदा करती है।

विरोध के दौरान आशा कार्यकर्ताओं ने एक अल्ट्रासाउंड चिकित्सक पर भी गर्भवती महिलाओं के मामलों में पर्याप्त सहयोग नहीं मिलने का आरोप लगाया। इस मुद्दे को लेकर अस्पताल परिसर में आशा कार्यकर्ताओं और चिकित्सक के बीच बहस भी हुई, जिसके बाद मामला गरमा गया।

सीएमएस बोलीं—गर्भवती और इमरजेंसी मरीजों को दी जाती है प्राथमिकता

मामले में प्रमुख चिकित्सा अधिकारी डॉ. द्रोपदी गर्ब्याल ने आशा कार्यकर्ताओं के आरोपों पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि जिला अस्पताल में प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज अल्ट्रासाउंड कराने पहुंचते हैं, जिसके कारण कतार लगना स्वाभाविक है।

उन्होंने बताया कि अस्पताल में आने वाले सभी मरीजों का क्रमवार अल्ट्रासाउंड किया जाता है, लेकिन गर्भवती महिलाओं और इमरजेंसी मामलों को प्राथमिकता दी जाती है। सामान्य मामलों में यदि उसी दिन जांच संभव नहीं हो पाती है तो मरीजों को अगले दिन का समय दिया जाता है।

अल्ट्रासाउंड चिकित्सक ने आरोपों को बताया निराधार

वहीं, अल्ट्रासाउंड चिकित्सक डॉ. रविंद्र कुमार ने कहा कि जिस मामले को लेकर आशा कार्यकर्ता उनके पास आई थीं, उस समय उनके साथ कोई मरीज मौजूद नहीं था और न ही उनके पास मरीज से संबंधित कोई आवश्यक दस्तावेज या जांच पत्र था।

डॉ. रविंद्र कुमार के अनुसार उन्होंने आशा कार्यकर्ता से मरीज को अस्पताल लाने और उसकी समस्या से संबंधित जानकारी देने को कहा था, लेकिन इसी दौरान आशा कार्यकर्ता उनके और अस्पताल स्टाफ के प्रति नाराज हो गईं, जिसके बाद विवाद की स्थिति बन गई।

उन्होंने बताया कि जिला अस्पताल में प्रतिदिन लगभग 35 से 40 अल्ट्रासाउंड किए जाते हैं, जिनमें से लगभग 7 से 8 जांच दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले मरीजों की होती हैं।

डॉ. रविंद्र कुमार ने कहा कि अल्ट्रासाउंड केवल एक सामान्य जांच प्रक्रिया नहीं है और प्रत्येक मरीज की स्थिति को ध्यानपूर्वक देखना आवश्यक होता है। एक मरीज की जांच में उसकी स्थिति के अनुसार लगभग 20 से 35 मिनट तक का समय लग सकता है। ऐसे में सभी मरीजों की जांच जल्दबाजी में करने के बजाय उन्हें सही तरीके से देखना जरूरी है।

स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर जारी है विवाद

बीडी पांडे जिला अस्पताल में अल्ट्रासाउंड सुविधा को लेकर आशा कार्यकर्ताओं और अस्पताल प्रशासन के बीच बढ़ता विवाद अब स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर रहा है। एक ओर आशा कार्यकर्ता गर्भवती महिलाओं के लिए अलग और बेहतर व्यवस्था की मांग कर रही हैं, वहीं अस्पताल प्रशासन सीमित संसाधनों के बावजूद गर्भवती महिलाओं और आपातकालीन मामलों को प्राथमिकता देने का दावा कर रहा है।

अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग आशा कार्यकर्ताओं की मांग पर क्या निर्णय लेता है और दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाली गर्भवती महिलाओं को अल्ट्रासाउंड के लिए अतिरिक्त या अलग सुविधा उपलब्ध कराई जाती है या नहीं।

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