हरिद्वार। रिश्तों में बढ़ती दूरियों और बुजुर्गों के प्रति घटते सम्मान के इस दौर में हरिद्वार से शुरू हुई एक अनूठी कांवड़ यात्रा मानवता, पारिवारिक मूल्यों और भारतीय संस्कारों की प्रेरणादायक मिसाल बन गई है। गौतमबुद्ध नगर के नोएडा सेक्टर-5 निवासी हिमांशु चौहान और उनके छोटे भाई प्रिंस राघव ने मां गंगा का पवित्र जल लेने के बाद अपनी 85 वर्षीय नानी रूपरानी को कांवड़ में बैठाकर करीब 200 किलोमीटर की पदयात्रा का संकल्प लिया है।
इस अनोखी कांवड़ यात्रा की सबसे खास बात यह है कि कांवड़ के एक ओर मां गंगा के तीन पवित्र कलश स्थापित हैं, जबकि दूसरी ओर उनकी 85 वर्षीय नानी रूपरानी विराजमान हैं। दोनों भाई इस कांवड़ को अपने कंधों पर लेकर पैदल यात्रा करते हुए 11 अगस्त को नोएडा सेक्टर-2 स्थित बड़े महादेव मंदिर पहुंचेंगे, जहां भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे।
हिमांशु चौहान पानी के व्यवसाय से जुड़े हैं, जबकि उनके छोटे भाई प्रिंस राघव कक्षा 11 के छात्र हैं। दोनों भाइयों का कहना है कि भगवान शिव की भक्ति के साथ-साथ बुजुर्गों की सेवा करना भी उनके जीवन का सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने अपनी नानी को यह सम्मान देकर समाज को यह संदेश देने का प्रयास किया है कि माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्मों से होना चाहिए।
इस यात्रा में केवल दोनों भाई ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है। मौसेरी बहनें लक्ष्मी चौहान, खुशी तोमर और जानवी राघव सहित अन्य परिजन भी पैदल यात्रा कर रहे हैं। परिवार रास्ते में स्वयं भोजन तैयार करता है और एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाते हुए शिवभक्ति, सेवा और पारिवारिक एकता का संदेश दे रहा है।
85 वर्षीय रूपरानी अपने नातियों के इस समर्पण से भावुक हैं। उन्होंने कहा कि आज के समय में कई बुजुर्ग उपेक्षा का शिकार होकर वृद्धाश्रम तक पहुंच जाते हैं, लेकिन उनके दोनों नाती उन्हें अपने कंधों पर बैठाकर कांवड़ यात्रा करा रहे हैं। उन्होंने कहा, “मेरे लिए ये दोनों साक्षात श्रवण कुमार हैं। मैं भगवान शिव और मां गंगा से इनके सुखी, स्वस्थ और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हूं।”
लक्ष्मी चौहान ने कहा कि उनके भाइयों ने यह साबित कर दिया है कि बुजुर्गों का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और प्रेम से निभाया जाने वाला सबसे बड़ा कर्तव्य है। खुशी तोमर ने बताया कि पूरी यात्रा में परिवार एक-दूसरे का संबल बना हुआ है और हर सदस्य इस आध्यात्मिक यात्रा को यादगार बनाने में जुटा है।
वहीं जानवी राघव ने कहा कि उनके भाइयों के दादा-दादी अब इस दुनिया में नहीं हैं। ऐसे में वे अपनी नानी को वही स्नेह, सम्मान और अपनापन दे रहे हैं, जिसकी हकदार हर बुजुर्ग होती है। उनका मानना है कि यदि हर परिवार अपने बुजुर्गों का सम्मान और सेवा करे तो समाज में वृद्धाश्रमों की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
दोनों भाइयों की यह अनूठी कांवड़ यात्रा श्रद्धालुओं के बीच आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। रास्ते में मिलने वाले लोग उनकी सराहना कर रहे हैं और उन्हें आधुनिक दौर का “श्रवण कुमार” बताते हुए उनके इस सेवा भाव को प्रणाम कर रहे हैं। यह यात्रा केवल शिवभक्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि समाज को बुजुर्गों के सम्मान, पारिवारिक एकता और भारतीय संस्कारों का जीवंत संदेश भी दे रही है।


