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वनस्पति विज्ञान, प्रकृति संरक्षण और अनुप्रयुक्त अनुसंधान पर हुआ मंथन; आई.डी. पांडे, प्रो. पी.एल. उनियाल और प्रो. सतीश चंद्र गरकोटी को डॉ. वाई.पी.एस. पांगती स्मृति पुरस्कार-2026 से किया गया सम्मानित

नैनीताल। प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद् स्वर्गीय प्रो. वाई. पी. एस. पांगती की स्मृति में डॉ. वाई. पी. एस. पांगती रिसर्च फाउंडेशन की ओर से आठवें प्रो. वाई. पी. एस. पांगती मेमोरियल लेक्चर का ऑनलाइन आयोजन किया गया।

कार्यक्रम में देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, वनस्पति वैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों, शोधार्थियों और प्रो. पांगती के पूर्व विद्यार्थियों एवं सहकर्मियों ने प्रतिभाग किया। इस दौरान वनस्पति विज्ञान के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण, पारिस्थितिकी, अनुसंधान और जलवायु कार्रवाई जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता आई.डी. पांडे, आईएफएस, पूर्व पीसीसीएफ एवं एचओएफएफ, उत्तराखंड रहे। उन्होंने ‘बॉटनी एंड द बिगिनर’ विषय पर अपना विशेष व्याख्यान दिया। कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रो. सतीश चंद्र गरकोटी तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. पी.एल. उनियाल की भी गरिमामयी उपस्थिति रही।

कार्यक्रम का शुभारंभ वनस्पति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. ललित तिवारी ने किया। उन्होंने स्वर्गीय प्रो. वाई. पी. एस. पांगती को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके व्यक्तित्व, कृतित्व और वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में किए गए महत्वपूर्ण योगदान को याद किया।

उन्होंने कहा कि प्रो. पांगती का वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और वनस्पति विज्ञान के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत रहेगा। उन्होंने कहा कि उन्हें प्रो. पांगती का विद्यार्थी होने पर गर्व है।

प्रो. कलाकोटी ने बताया स्मृति व्याख्यान का महत्व

वाई. पी. एस. पांगती रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. बी. एस. कलाकोटी ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल प्रो. पांगती को स्मरण करने का अवसर नहीं है, बल्कि उनके वैज्ञानिक मूल्यों, विचारों और प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण को आत्मसात कर उन्हें आगे बढ़ाने का भी अवसर है।

कार्यक्रम के दौरान डॉ. बी. एस. कलाकोटी ने जलवायु कार्रवाई के महत्व पर आधारित अपनी स्वरचित प्रेरणादायक कविता भी प्रस्तुत की, जिसने कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता का संदेश दिया।

बिगिनर’ की सोच से सीखने और सवाल पूछने का संदेश

डॉ. गोपाल सिंह रावत ने मुख्य वक्ता आई.डी. पांडे का परिचय प्रस्तुत किया। उन्होंने प्रो. पांगती के समर्पण, सादगी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी।

अपने व्याख्यान में आई.डी. पांडे ने कहा कि वे स्वयं वनस्पति विज्ञानी नहीं हैं, लेकिन भारतीय वन सेवा में लंबे कार्यकाल के दौरान उन्हें प्रकृति और वनस्पतियों को करीब से समझने और उनसे सीखने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि वनस्पति विज्ञान का ज्ञान केवल पुस्तकों और वीडियो तक सीमित नहीं होना चाहिए। प्रत्यक्ष अवलोकन, प्रकृति के साथ जुड़ाव और व्यावहारिक अनुभव भी इसके महत्वपूर्ण आधार हैं।

उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि उन्हें सवाल पूछने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए। एक ‘बिगिनर’ की सोच पूर्वाग्रहों से मुक्त होती है और यही सोच कई बार नई खोज और नए निष्कर्षों का आधार बन सकती है।

आई.डी. पांडे ने कोलेट का उदाहरण देते हुए बताया कि वनस्पति विज्ञानी न होने के बावजूद उन्होंने अपने अवलोकन और रुचि के माध्यम से पौधों का महत्वपूर्ण दस्तावेजीकरण किया। उन्होंने मुनस्यारी में कुटकी से जुड़े अपने अनुभव के साथ उत्तराखंड में चीर, पॉपलर, क्लोनल प्लांटिंग और टिश्यू कल्चर से संबंधित व्यावहारिक अनुभव भी साझा किए।

उन्होंने कहा कि प्रकृति में पौधों और जीवों के बीच मौजूद पारस्परिक संबंधों को समझना आवश्यक है। साथ ही अनुसंधान को स्थानीय आवश्यकताओं से जोड़ने पर विशेष जोर दिया।

अवलोकन, निष्कर्ष और कार्य को बताया वनस्पति विज्ञान का आधार

आई.डी. पांडे ने वनस्पति विज्ञान के तीन महत्वपूर्ण सिद्धांतों—अवलोकन, निष्कर्ष और कार्य—पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि शोध केवल अकादमिक उपलब्धि तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका लाभ समाज और पर्यावरण तक पहुंचना चाहिए।

उन्होंने विद्यार्थियों के लिए सेमिनार, वर्कशॉप और कॉन्फ्रेंस को वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उनके अनुसार ऐसे आयोजनों से विद्यार्थियों में जिज्ञासा, तार्किक सोच, संवाद की क्षमता और व्यावहारिक ज्ञान विकसित होता है।

प्रो. पी.एल. उनियाल ने अनुप्रयुक्त एवं ट्रांसलेशनल रिसर्च पर दिया जोर

प्रो. नीलू लोधियाल ने द्वितीय वक्ता प्रो. पी.एल. उनियाल का परिचय कराया। प्रो. उनियाल ने प्रो. वाई. पी. एस. पांगती को अत्यंत विनम्र, समर्पित और ज्ञानवान व्यक्तित्व बताते हुए उनके साथ अपने अनुभव साझा किए।

उन्होंने कहा कि प्रो. पांगती की रुचि केवल पौधों के वैज्ञानिक अध्ययन तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे उनके आर्थिक एवं व्यावहारिक उपयोगों को लेकर भी गंभीरता से कार्य करते थे। सीमित संसाधनों के बावजूद उनका व्यापक शोध कार्य और प्रकाशन वैज्ञानिक समुदाय के लिए प्रेरणादायी हैं।

प्रो. उनियाल ने वर्तमान समय में अनुप्रयुक्त एवं ट्रांसलेशनल रिसर्च, पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन, वनस्पतियों की कार्यात्मक विविधता के आकलन और जलमार्गों के मानचित्रण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने स्मृति व्याख्यान का हिस्सा बनने पर आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान उन्हें भविष्य में भी शोध के क्षेत्र में योगदान देने के लिए प्रेरित करेगा।

प्रो. नगरकोटी ने याद की प्रो. पांगती की अद्भुत पौधा पहचान क्षमता

प्रो. भावना पाठक ने तृतीय वक्ता प्रो. सतीश चंद्र गरकोटी का परिचय प्रस्तुत किया। प्रो. गरकोटी ने कहा कि प्रो. पांगती की तीन पीढ़ियों के विद्यार्थी और सहकर्मी आज भी उनके प्रति समान सम्मान और आत्मीयता रखते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रो. पांगती बेहद सहज और सुलभ व्यक्तित्व के धनी थे। कोई व्यक्ति उनका विद्यार्थी हो या नहीं, वह उनसे मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता था। प्रो. गरकोटी ने प्रो. पांगती के गहन वनस्पति ज्ञान और पौधों की पहचान करने की अद्भुत क्षमता को विशेष रूप से याद किया।

उन्होंने कहा कि प्रो. पांगती ने कई नई प्रजातियों की पहचान और रिपोर्टिंग में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी पौधों की पहचान की क्षमता इतनी प्रभावशाली थी कि जहां किसी टैक्सोनॉमिस्ट को किसी नमूने की पहचान में काफी समय लग सकता था, वहीं प्रो. पांगती बातचीत के दौरान ही पौधे की पहचान कर लेते थे।

प्रो. गरकोटी ने उन्हें उत्कृष्ट प्राकृतिक इतिहासकार और पारिस्थितिकीविद् बताते हुए कहा कि उनकी प्रजाति-पहचान विशेषज्ञता ने पारिस्थितिकीविदों को विभिन्न प्रजातियों की गतिशीलता और उनके पारस्परिक संबंधों को समझने में महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया।

तीनों वक्ताओं को डॉ. वाई.पी.एस. पांगती स्मृति पुरस्कार-2026 से सम्मानित किया

स्मृति व्याख्यान के दौरान अपने-अपने क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान के लिए तीनों वक्ताओं को डॉ. वाई.पी.एस. पांगती स्मृति पुरस्कार-2026 के प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

आई.डी. पांडे, प्रो. पी.एल. उनियाल, दिल्ली विश्वविद्यालय तथा प्रो. सतीश चंद्र गरकोटी, जेएनयू को यह सम्मान उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रदान किया गया।

वैज्ञानिक समुदाय ने प्रो. पांगती के योगदान को किया याद

कार्यक्रम में डॉ. एस.एस. सामंत, डॉ. हरि एस. बिष्ट, डॉ. चंद्रशेखर, डॉ. एस.डी. तिवारी सहित अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे और प्रो. वाई. पी. एस. पांगती के व्यक्तित्व एवं वैज्ञानिक योगदान को याद किया।

कार्यक्रम में पूर्व एचओएफएफ धनंजय मोहन, लता निर्बल, डॉ. नवीन पांडे, प्रो. अनिल जोशी, डॉ. पेनी जोशी, डॉ. रीमा मिश्रा, डॉ. दीप्ति नेगी, डॉ. गीता तिवारी, डॉ. एस.डी. तिवारी, डॉ. एच.एस. बिष्ट, डॉ. समीर पांडे, डॉ. ज्योति कांडपाल, डॉ. गिरीश जोशी, डॉ. मनोज बिष्ट, डॉ. भावना पाठक और डॉ. नीलू लोधियाल सहित अनेक शिक्षाविद्, वैज्ञानिक और शोधकर्ता उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का सफल संचालन प्रो. ललित तिवारी ने किया। अंत में डॉ. श्रीकर पंत ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के समापन पर डॉ. यशपाल सिंह पांगती को नमन करते हुए उनकी स्मृति और वैज्ञानिक विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया गया।

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