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नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से हल्द्वानी के बेल बाबा क्षेत्र में स्थानांतरित करने और प्रस्तावित भूमि को लेकर दायर याचिका पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद शुक्रवार को अपना निर्णय सुनाते हुए याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, याचिकाकर्ता पक्ष से जुड़े अधिवक्ताओं ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कही है।

मामले में राज्य आंदोलनकारी एवं अधिवक्ता रमन साह सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर नैनीताल से हल्द्वानी के बेल बाबा क्षेत्र में प्रस्तावित हाईकोर्ट स्थानांतरण के लिए भूमि चयन और आरक्षण की प्रक्रिया पर गंभीर कानूनी सवाल उठाए थे।

याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि जिलाधिकारी नैनीताल द्वारा उच्च न्यायालय के लिए बेल बाबा मंदिर के समीप स्थित रिजर्व फॉरेस्ट भूमि का प्रस्ताव तैयार करना वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की धारा-2 का सीधा उल्लंघन है। उनका कहना था कि संबंधित भूमि के उपयोग में परिवर्तन या उसे वन क्षेत्र की श्रेणी से हटाने के लिए केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति आवश्यक है।

हाथी कॉरिडोर और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण का भी उठाया मुद्दा

याचिका में यह भी कहा गया कि जिस क्षेत्र को उच्च न्यायालय परिसर के लिए चिन्हित किया गया है, वहां बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया है। साथ ही याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि संबंधित क्षेत्र हाथी कॉरिडोर के अंतर्गत आता है, इसलिए वहां बड़े निर्माण कार्य से पर्यावरण और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

केंद्र सरकार की अनिवार्य मंजूरी के मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के 15 जुलाई 2026 के आदेश और उत्तराखंड सरकार की 12 अगस्त 2026 की अधिसूचना का भी हवाला दिया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इन दस्तावेजों में संबंधित भूमि को वन भूमि के रूप में ही माना गया है।

केंद्र की अनुमति के बिना भूमि का स्वरूप बदलना गैरकानूनी होने का आरोप

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के प्रावधानों के अनुसार रिजर्व फॉरेस्ट भूमि को डी-रिजर्व करने या उसके उपयोग एवं स्वरूप में परिवर्तन करने के लिए केंद्र सरकार की अनुमति आवश्यक है। उनका आरोप था कि राज्य सरकार अथवा अन्य स्थानीय प्राधिकरण अपने स्तर से ऐसी भूमि के हस्तांतरण या उपयोग परिवर्तन का अंतिम निर्णय नहीं ले सकते।

याचिका में कहा गया कि यदि केंद्र सरकार की आवश्यक मंजूरी के बिना वन भूमि को उच्च न्यायालय परिसर के लिए आरक्षित अथवा हस्तांतरित किया जाता है तो यह कानून और पर्यावरणीय नियमों के विपरीत होगा।

सरकार ने किया याचिकाकर्ताओं के तर्कों का खंडन

वहीं, राज्य सरकार की ओर से अदालत में उपस्थित अधिवक्ताओं ने याचिकाकर्ताओं के सभी आरोपों और तर्कों का खंडन किया। सरकार की ओर से कहा गया कि उच्च न्यायालय के स्थानांतरण से संबंधित आगे की प्रक्रिया नियमानुसार संचालित की जा रही है और आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाएगा।

सरकार ने याचिकाकर्ताओं के इस दावे को भी चुनौती दी कि प्रस्तावित स्थल हाथी कॉरिडोर का हिस्सा है। राज्य सरकार का स्पष्ट पक्ष था कि जिस स्थान पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय को स्थानांतरित करने का प्रस्ताव है, वह क्षेत्र हाथी कॉरिडोर के अंतर्गत नहीं आता।

सभी पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने सुनाया फैसला

मामले में सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने पहले अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था। शुक्रवार को खंडपीठ ने निर्णय सुनाते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

याचिका खारिज होने के बाद अब हाईकोर्ट स्थानांतरण और बेल बाबा क्षेत्र की प्रस्तावित भूमि को लेकर चल रही कानूनी बहस एक नए चरण में पहुंच सकती है। याचिकाकर्ता पक्ष से जुड़े अधिवक्ताओं का कहना है कि वे उच्च न्यायालय के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के लिए याचिका दायर करेंगे।

ऐसे में नैनीताल से हल्द्वानी के बेल बाबा क्षेत्र में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के प्रस्तावित स्थानांतरण का मामला आने वाले दिनों में एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक पहुंच सकता है।

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