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नैनीताल के निकटवर्ती गेठिया गांजा सरियाताल ज्योलीकोट में दूषित पानी पीने से पीलिया डायरिया जैसे गंभीर बीमारी फैलने से 2 लोगों की मौत, 400 लोग भर्ती हुए

रिपोर्टर गुड्डू सिंह ठठोला

नैनीताल। भीमताल ब्लॉक के ज्योलीकोट और आसपास के गांवों में दूषित पेयजल से फैली बीमारी अब गंभीर संकट का रूप ले चुकी है।

पिछले दिनों बीमारी की चपेट में आने से दो लोगों की मौत के बाद क्षेत्र में दहशत और आक्रोश का माहौल है।

ग्रामीणों का आरोप है कि करीब 25 जून से बिगड़े हालात के बावजूद जिम्मेदार विभागों और जनप्रतिनिधियों की ओर से समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया जा सका है।

ज्योलीकोट, गांजा छिना, सड़ियाताल, बेलवाखान समेत आसपास के करीब 7 से 10 गांवों में 400 से अधिक लोगों के बीमार होने की बात सामने आ रही है। ग्रामीणों के अनुसार कई लोग पीलिया, डायरिया, टायफाइड समेत अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं।

स्थानीय स्तर पर ज्योलीकोट और नैनीताल में प्राथमिक उपचार तो मिल रहा है, लेकिन गंभीर मरीजों को बेहतर इलाज के लिए हल्द्वानी, बरेली और दिल्ली तक जाना पड़ रहा है।

इलाज में जा रहा लाखों का खर्च, गरीब परिवारों पर बढ़ा आर्थिक बोझ

बीमारी ने ग्रामीणों के स्वास्थ्य के साथ-साथ उनकी आर्थिक स्थिति पर भी बड़ा असर डाला है। ग्रामीणों का कहना है कि केवल जांच और टेस्ट कराने में ही 20 से 40 हजार रुपये तक का खर्च आ रहा है, जबकि कई परिवार इलाज पर अब तक एक लाख रुपये से अधिक खर्च कर चुके हैं। क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग छोटे-मोटे कारोबार और मजदूरी के जरिए परिवार चलाते हैं। ऐसे में महंगा इलाज कराना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

ग्रामीणों का आरोप है कि निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान उनका आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा है और कई मरीजों को सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का पर्याप्त लाभ नहीं मिल पा रहा है। लोगों की मांग है कि जिला प्रशासन और राज्य सरकार बीमारी से प्रभावित मरीजों के इलाज की पूरी व्यवस्था नि:शुल्क करे और जिन मरीजों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, उनके इलाज का खर्च सरकार उठाए।

जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचे, नेताओं से भी नाराजगी

ग्रामीणों में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि इतने बड़े स्वास्थ्य संकट के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लेने में कथित तौर पर नाकाम रहे। लोगों का कहना है कि दूषित पानी की समस्या लंबे समय से बनी हुई है, लेकिन अब तक उन्हें स्थायी रूप से स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं कराया जा सका है।

ग्रामीणों का कहना है कि स्थानीय विधायक और सांसद से भी उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिल सकी। वहीं, स्वास्थ्य विभाग की स्थानीय व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक ज्योलीकोट में मौजूद स्वास्थ्य केंद्र में गंभीर मरीजों की जांच और उपचार के लिए पर्याप्त मशीनें एवं संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में मरीजों को मजबूरी में बड़े शहरों के अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है।

दो मौतों के बाद गांव में बढ़ा आक्रोश

दूषित पानी से बीमारी फैलने के बीच दो लोगों की मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर समय रहते दूषित पानी की समस्या का समाधान किया जाता और पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जातीं तो हालात इतने गंभीर नहीं होते।

ग्रामीणों में अब इस बात को लेकर भी चिंता है कि बीमारी लगातार फैलती रही तो आने वाले दिनों में स्थिति और भयावह हो सकती है। लोगों ने प्रशासन से तत्काल स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने, पानी के स्रोतों की जांच कराने, प्रभावित गांवों में मेडिकल कैंप लगाने और गंभीर मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने की मांग की है।

ब्लॉक प्रमुख ने दी अधिकारियों पर कार्रवाई की चेतावनी

ब्लॉक प्रमुख हरीश बिष्ट ने कहा कि बीमारी के कारण दो लोगों की असमय मौत होना बेहद गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। उन्होंने कहा कि दो मौतों के बाद पूरे ज्योलीकोट क्षेत्र के व्यापारियों और ग्रामीणों में आक्रोश है।

उन्होंने बताया कि जल संस्थान और स्वास्थ्य विभाग को स्वास्थ्य सुविधाओं और पेयजल व्यवस्था को दुरुस्त करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन इसके बावजूद बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाया है। कई लोग अभी भी हल्द्वानी, बरेली और दिल्ली के अस्पतालों में उपचार करा रहे हैं।

हरीश बिष्ट ने चेतावनी दी कि यदि अगले 10 दिनों में बीमारी की स्थिति नियंत्रित नहीं हुई तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की जाएगी।

ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल बीमारी का मामला नहीं, बल्कि गरीब परिवारों के सामने खड़े बड़े आर्थिक संकट का भी सवाल है। लोगों ने सरकार से मांग की है कि प्रभावित क्षेत्र के सभी मरीजों की जांच और उपचार सरकारी खर्च पर कराया जाए, निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों के इलाज में आर्थिक सहायता दी जाए और प्रभावित गांवों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम भेजी जाए।

साथ ही दूषित पेयजल की समस्या का स्थायी समाधान करते हुए पानी के सभी स्रोतों की जांच कराकर लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि यदि बीमारी की वजह दूषित पानी है तो केवल मरीजों का इलाज करने से समस्या खत्म नहीं होगी, बल्कि बीमारी के मूल कारण को खत्म करना होगा।

दो मौतों और सैकड़ों लोगों के बीमार होने के बावजूद यदि अब भी प्रशासन ने तत्काल कदम नहीं उठाए, तो यह स्वास्थ्य संकट और गंभीर रूप ले सकता है।

स्थानीय लोगों का सवाल है कि जब वे अपने सीमित संसाधनों से इलाज कराने को मजबूर हैं, तब आखिर सरकार और प्रशासन उनकी मदद के लिए कब आगे आएगा?

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