लालकुआं/बिंदुखत्ता। बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर वन अधिकार संगठन का आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। संगठन की पदयात्रा शनिवार को 29वें दिन भी जारी रही। इस दौरान सैकड़ों महिला-पुरुषों और बच्चों ने पदयात्रा में शामिल होकर सरकार से बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम घोषित करने के लिए तत्काल अधिसूचना जारी करने की मांग की।
शनिवार को पदयात्रा तिवारी नगर स्थित हाट कालिका मंदिर से शुरू हुई। इसके बाद पदयात्री शास्त्री नगर होते हुए 17 एकड़ क्षेत्र के पास स्थित भगवती मंदिर पहुंचे। पूरे मार्ग में आंदोलनकारियों ने ‘बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम बनाओ’, ‘घोषणा नहीं, अधिसूचना चाहिए’ जैसे नारे लगाकर अपनी मांग को बुलंद किया।
वन अधिकार संगठन के पदाधिकारियों और आंदोलनकारियों ने कहा कि बिंदुखत्ता की जनता वर्षों से राजस्व ग्राम का दर्जा पाने के लिए संघर्ष कर रही है। विभिन्न सरकारों और जनप्रतिनिधियों की ओर से समय-समय पर आश्वासन जरूर दिए गए, लेकिन अब तक राजस्व ग्राम बनाने की अंतिम अधिसूचना जारी नहीं हो सकी है। आंदोलनकारियों ने स्पष्ट कहा कि अब बिंदुखत्ता की जनता केवल आश्वासन सुनने को तैयार नहीं है और उसका संघर्ष अब अधिकारों की कानूनी मान्यता के लिए है।
‘जब प्रक्रिया पूरी हो चुकी है तो अधिसूचना में देरी क्यों?’
पदयात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों पर नुक्कड़ सभाएं आयोजित की गईं। वक्ताओं ने कहा कि वन अधिकार कानून के तहत बिंदुखत्ता से संबंधित प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। संगठन के अनुसार, 19 जून 2024 को जिला स्तरीय समिति द्वारा सर्वसम्मति से प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है, लेकिन इसके बावजूद राजस्व ग्राम बनाए जाने की अधिसूचना अभी तक जारी नहीं की गई है।
वक्ताओं ने सरकार से सवाल किया कि जब आवश्यक प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और प्रस्ताव शासन स्तर तक पहुंच चुका है, तो फिर अधिसूचना जारी करने में देरी किस कारण से हो रही है।
संगठन के सदस्यों ने कहा कि नए कानून के तहत अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया में पुराने प्रावधानों के आधार पर वन भूमि के अनारक्षण, बदले में दूसरी भूमि उपलब्ध कराने अथवा केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की अनुमति जैसी बाध्यताओं को अनावश्यक रूप से लागू नहीं किया जाना चाहिए।
स्वरचित गीतों के माध्यम से सुनाया बिंदुखत्ता का इतिहास
पदयात्रा के दौरान वन अधिकार संगठन के सदस्य एवं लोक कलाकार दीपक पाठक ने स्वरचित गीतों के माध्यम से बिंदुखत्ता की बसासत, उसके इतिहास और राजस्व ग्राम की मांग को प्रभावी ढंग से लोगों के सामने रखा।
उन्होंने कहा कि बिंदुखत्ता की बसासत वर्ष 1932 से भी पहले की है। वर्ष 1932 से जुड़े दस्तावेजी प्रमाण, वर्ष 1952 में स्थापित विद्यालय और वर्ष 1960 के दशक में स्थापित दुग्ध डेयरी क्षेत्र की पुरानी बसासत के प्रमाण हैं।

दीपक पाठक ने दावा किया कि वन विभाग स्वयं वर्ष 1966 के बाद इस क्षेत्र में आया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब बिंदुखत्ता की पत्रावली में आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं तो राजस्व ग्राम की अधिसूचना जारी करने में आखिर देरी किस बात की है।
उन्होंने कहा कि वन अधिकार कानून लागू होने के बाद देश में 1700 से अधिक वन ग्रामों को राजस्व ग्राम का दर्जा मिल चुका है। ऐसे में बिंदुखत्ता के मामले में प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद अधिसूचना जारी नहीं होना क्षेत्रवासियों के लिए चिंता और असंतोष का विषय है।
‘अब सवाल आश्वासन का नहीं, अधिसूचना का है’
पदयात्रा में वक्ताओं ने कहा कि बिंदुखत्ता के लोगों ने लंबे समय तक सरकारों और जनप्रतिनिधियों से राजस्व ग्राम बनाने के आश्वासन सुने हैं। लेकिन अब जनता की मांग बिल्कुल स्पष्ट है—बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम बनाने की अधिसूचना तत्काल जारी की जाए।
आंदोलनकारियों ने कहा कि क्षेत्र की जनता अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से संघर्ष जारी रखेगी। पदयात्रा के आगामी चरण में संगठन बिंदुखेड़ा क्षेत्र में प्रवेश करेगा और वहां भी जनसंपर्क कर राजस्व ग्राम की मांग को और व्यापक बनाया जाएगा।
सैकड़ों लोग हुए पदयात्रा में शामिल
पदयात्रा में उमेश भट्ट, अर्जुन नाथ गोस्वामी, नंदन बोरा, चंचल सिंह कोरंगा, इंद्र सिंह पनेरी, हीरा सिंह बिष्ट, दौलत सिंह कोरंगा, खुशाल सिंह कोश्यारी, बलवंत बिष्ट, भवान सिंह कठायत, बलवंत सम्मल, कमल सिंह बिष्ट, रमेश बिष्ट, लोक कलाकार जीवन पाण्डे, दीपक पाठक, सोहन लाल, भरत नेगी, दीपक जोशी, भूपेश जोशी, करम सिंह कोरंगा, दानी कोरंगा, ममता बिष्ट और मीना मेहता समेत सैकड़ों महिला, पुरुष और बच्चे शामिल रहे।
बिंदुखत्ता की राजस्व ग्राम की मांग को लेकर लगातार 29 दिनों से जारी पदयात्रा अब क्षेत्र में एक बड़े जनआंदोलन का रूप लेती दिखाई दे रही है। आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक राजस्व ग्राम की अधिसूचना जारी नहीं हो जाती, तब तक उनका लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रहेगा।




