कुमाऊं विश्वविद्यालय में शोध पद्धति कार्यशाला के तीसरे दिन बौद्धिक संपदा अधिकारों के विभिन्न पहलुओं पर दी गई जानकारी

नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के प्रायोजन में आयोजित दस दिवसीय शोध पद्धति कार्यशाला के तीसरे दिन बौद्धिक संपदा अधिकारों के महत्व पर व्याख्यान दिया गया। इस दौरान कुमाऊं विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफेसर निदेशालय के निदेशक एवं वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. ललित तिवारी ने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार शोधार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनकी जानकारी न केवल शोध कार्य को बेहतर बनाने में मदद करती है, बल्कि शोधार्थियों की आर्थिक उन्नति और नवाचार को भी प्रोत्साहित करती है।

प्रो. तिवारी ने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार आविष्कारों, रचनात्मक कार्यों और नई खोजों को संरक्षण प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शोधार्थियों को इन अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए, ताकि वे अपने शोध से प्राप्त निष्कर्षों, आविष्कारों और रचनात्मक उपलब्धियों को उचित संरक्षण दे सकें। इससे देश में शोध एवं विकास की गति को बढ़ाने के साथ-साथ शोध आधारित उद्यमिता को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

उन्होंने कहा कि मनुष्य का मस्तिष्क अद्भुत क्षमताओं से परिपूर्ण है। सकारात्मक सोच, रचनात्मकता और निरंतर प्रयासों के माध्यम से कठिन से कठिन समस्याओं का समाधान खोजा जा सकता है। उन्होंने शोधार्थियों को अपनी बौद्धिक क्षमता का उपयोग नए विचारों, नवाचारों और समाजोपयोगी शोध कार्यों के लिए करने के लिए प्रेरित किया।

बौद्धिक संपदा अधिकारों के विभिन्न स्वरूपों की दी जानकारी

प्रो. तिवारी ने बौद्धिक संपदा अधिकारों के विभिन्न स्वरूपों की जानकारी देते हुए बताया कि इनमें कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, पेटेंट, औद्योगिक डिजाइन, भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग), लेआउट डिजाइन, व्यापार रहस्य तथा पौधों की किस्मों का संरक्षण प्रमुख रूप से शामिल हैं। उन्होंने बताया कि इन अधिकारों के माध्यम से रचनाकारों, आविष्कारकों और शोधकर्ताओं के कार्यों को कानूनी संरक्षण मिलता है। साथ ही, उनके नवाचारों के व्यावसायिक उपयोग और आर्थिक लाभ प्राप्त करने की संभावनाएं भी बढ़ती हैं।

उन्होंने बौद्धिक संपदा अधिकारों के अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य पर प्रकाश डालते हुए बताया कि व्यापार-संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकारों (ट्रिप्स) के अंतर्गत वैश्विक स्तर पर इनके संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए। विश्व व्यापार संगठन के ट्रिप्स समझौते के तहत 1 जनवरी 1995 से सदस्य देशों के लिए बौद्धिक संपदा संरक्षण से संबंधित नियम लागू हुए।

उत्तराखंड के जीआई टैग उत्पादों का भी किया उल्लेख

व्याख्यान के दौरान प्रो. तिवारी ने उत्तराखंड के पारंपरिक उत्पादों और स्थानीय पहचान को संरक्षण देने में जीआई टैग की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने राज्य के लाल चावल, दान (पारंपरिक अनाज) सहित अन्य स्थानीय उत्पादों का उल्लेख करते हुए बताया कि भौगोलिक संकेतक किसी क्षेत्र विशेष की विशिष्ट पहचान और परंपरागत उत्पादों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में मददगार होते हैं।

उन्होंने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रति जागरूकता से शोधार्थी अपने शोध परिणामों को व्यावहारिक उपयोग में ला सकते हैं।

इससे नए आविष्कारों, उद्यमिता और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा मिलने के साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।

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