ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलशहस्ताय सर्वमयविनाशाय त्रैलोक्यनाथाय श्री महाविष्णवे नमः ॥

धनतेरस और भगवान धन्वन्तरि एवं धनतेरस का आपस में महत्वपूर्ण संबंध अ है; वास्तव में धनतेरस का त्योहार भगवान धन्वन्तरि के प्राकट्य उत्सव (जयंती) है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वन्तरि अपने हाथों में अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे।

चूंकि वह त्रयोदशी तिथि को प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन को ‘धनत्रयोदशी’ या ‘धनतेरस’ कहा जाता है। भगवान धन्वन्तरि को भगवान विष्णु का अंश और देवताओं का चिकित्सक (वैद्य) माना जाता है। उन्होंने अवतरित होते ही संसार के कल्याण के लिए आयुर्वेद शास्त्र का प्रादुर्भाव किया। इसी कारण भारत सरकार द्वारा धनतेरस (धन्वन्तरि जयंती) को “राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस” के रूप में भी मनाया जाता है।

समुद्र मंथन से प्रकट होते समय उनके चार हाथों में अमृत कलश, औषधियां, शंख और चक्र विद्यमान थे। धनतेरस केवल भौतिक धन नहीं बल्कि ‘स्वास्थ्य रूपी धन’ से है। निरोगी काया की कामना के लिए इस दिन भगवान धन्वन्तरि की विशेष पूजा की जाती है।

धनवंतरी भगवान के हाथ में पीतल का कलश था इसलिए इस दिन धातु की बर्तन खरीदने की परंपरा शुरू हुई ।धनतेरस की शाम को सुख-समृद्धि के लिए माता लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा के साथ मृत्यु के भय से मुक्ति के लिए घर के मुख्य द्वार पर यमराज के नाम का दीपक (यमदीपदान) किया जाता है।

इस दिन आर्थिक संपन्नता के लिए साबुत धनिया खरीदना और घर की दरिद्रता व नकारात्मकता दूर करने के प्रतीक स्वरूप झाड़ू खरीदना भी एक लोकप्रिय परंपरा है।

 इसीलिए कहा गया है ।

आरोग्यं परमं भाग्यं, स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्॥

भगवान धन्वंतरि की कृपा और माँ लक्ष्मी के आशीर्वाद से सभी के जीवन में सुख,

समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य एवं खुशहाली बनी रहे।

शुभ धनतेरस

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