नैनीताल। नीब करौरी बाबा का नाम सामने आते ही उत्तराखंड के नैनीताल जिले में भवाली के समीप स्थित प्रसिद्ध कैंची धाम की तस्वीर मन में उभरती है। महाराजजी के नाम से प्रसिद्ध बाबा नीब करौरी की शिक्षाओं, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रभाव के प्रति देश-विदेश में लोगों की रुचि लगातार बढ़ी है।

इसका असर कैंची धाम में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या पर भी साफ दिखाई दे रहा है। मंदिर परिसर में सामान्य दिनों में भी बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं, जबकि सप्ताहांत और विशेष अवसरों पर भीड़ कई गुना बढ़ जाती है।

सामान्य दिनों में हजारों श्रद्धालु, वीकेंड पर बढ़ती है भीड़

कैंची धाम में सामान्य दिनों में करीब 4,000 से 5,000 श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। विशेष अवसरों पर यह संख्या 6,000 से अधिक हो जाती है। वहीं सप्ताहांत में श्रद्धालुओं की संख्या कई बार 15,000 से 20,000 तक पहुंचने की बात सामने आती है।

श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या का सीधा असर क्षेत्र की यातायात व्यवस्था पर पड़ता है। हल्द्वानी से भवाली होते हुए कैंची धाम जाने वाले मार्ग पर वाहनों का दबाव बढ़ जाता है। भीमताल, भवाली और गरमपानी क्षेत्र में भी कई बार वाहनों की लंबी कतारें लग जाती हैं। इसका असर नैनीताल और अल्मोड़ा की ओर जाने वाले यातायात पर भी पड़ता है और यात्रियों को सामान्य से अधिक समय सफर में लग सकता है।

नीम करोली बाबा कौन थे? जानिए कैंची धाम के महाराज जी का जीवन, साधना और संदेश

उत्तराखंड के नैनीताल जिले में भवाली से करीब 9 किलोमीटर और नैनीताल से करीब 17 किलोमीटर दूर नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर स्थित कैंची धाम आज देश-दुनिया के श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र है। यह धाम संत नीम करोली बाबा, जिन्हें उनके अनुयायी प्रेम से महाराज जी कहते हैं, से जुड़ा है। 

बाबा नीम करोली का असली नाम क्या था?

नीम करोली बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव में करीब 1900 के आसपास हुआ माना जाता है। उनका मूल नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा बताया जाता है। बाद के वर्षों में वे साधु जीवन की ओर चले गए और देश के अलग-अलग हिस्सों में भ्रमण एवं साधना की। 

उनका संबंध उत्तर प्रदेश के नीब करौरी गांव से भी रहा। इसी वजह से वे नीब करौरी बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए। समय के साथ बोलचाल में इसका रूप नीम करोली बाबा हो गया।

हनुमान जी के अनन्य भक्त

महाराज जी की आध्यात्मिक साधना का सबसे प्रमुख केंद्र भगवान हनुमान की भक्ति था। उनके अनुयायी उन्हें हनुमान जी का अनन्य भक्त और कई श्रद्धालु हनुमान जी का अंश या स्वरूप मानते हैं। हालांकि यह आस्था का विषय है, ऐतिहासिक रूप से इतना स्पष्ट है कि उनकी शिक्षाओं और साधना में हनुमान भक्ति का महत्वपूर्ण स्थान था। 

उनकी शिक्षा का मूल भाव था कि ईश्वर की भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि प्रेम, सेवा और जरूरतमंदों की सहायता के रूप में भी दिखाई देनी चाहिए।

कैसे बना कैंची धाम?

कैंची क्षेत्र से बाबा का जुड़ाव 1960 के दशक में मजबूत हुआ। स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध विवरणों के अनुसार, बाबा ने यहां आश्रम और मंदिर परिसर विकसित कराया। 15 जून 1964 को यहां हनुमान मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हुई और यही तारीख आगे चलकर कैंची धाम के स्थापना दिवस के रूप में प्रसिद्ध हुई। 

कैंची नाम को लेकर भी एक रोचक तथ्य है। उत्तराखंड सरकार के नैनीताल जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार, यहां सड़क के दो तीखे मोड़ कैंची की आकृति जैसे दिखाई देते हैं, इसलिए इस क्षेत्र को कैंची कहा गया। प्रशासनिक स्रोत स्पष्ट करता है कि इसका नाम कैंची वास्तव में इन्हीं दो हेयरपिन मोड़ों से जुड़ा है। 

15 जून को क्यों लगता है बड़ा मेला?

हर साल 15 जून को कैंची धाम का स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और भंडारे की परंपरा इस आयोजन को विशेष बनाती है। 

कैंची धाम की प्रसिद्धि केवल उत्तराखंड या भारत तक सीमित नहीं रही। समय के साथ विदेशों में भी महाराज जी के अनुयायी और उनसे जुड़े आश्रम एवं आध्यात्मिक केंद्र स्थापित हुए।

विदेशों तक पहुंची बाबा की ख्याति

नीम करोली बाबा के जीवन और शिक्षाओं से प्रभावित होने वाले पश्चिमी साधकों में राम दास (Richard Alpert), कृष्ण दास और लैरी ब्रिलियंट जैसे नाम प्रमुख रूप से लिए जाते हैं। बाबा के साथ संपर्क के बाद राम दास ने अपने आध्यात्मिक अनुभवों को दुनिया तक पहुंचाया, जिससे पश्चिमी देशों में भी महाराज जी और कैंची धाम के बारे में लोगों की रुचि बढ़ी। 

इसी कारण कैंची धाम धीरे-धीरे भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक यात्राओं के नक्शे पर भी आया।

बाबा की प्रसिद्ध शिक्षाएं

नीम करोली बाबा का संदेश बहुत सरल माना जाता है। उनके विचारों का केंद्र था—

सबसे प्रेम करो।

दूसरों की सेवा करो।

जरूरतमंद को भोजन कराओ।

ईश्वर का स्मरण करते रहो।

हर व्यक्ति में ईश्वर का अंश देखो।

यही कारण है कि उनके अनुयायियों के बीच सेवा और भंडारे की परंपरा को विशेष महत्व मिलता है।

बाबा के चमत्कारों की कहानियां

नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़ी अनेक चमत्कारिक कथाएं उनके भक्तों और शिष्यों द्वारा सुनाई जाती हैं। इनमें ट्रेन रुकने, भोजन की व्यवस्था होने और उनकी दिव्य शक्तियों से जुड़ी कई कहानियां शामिल हैं।

इन घटनाओं को श्रद्धालु आस्था और बाबा की आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ते हैं, लेकिन इन्हें ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि बाबा से जुड़ी भक्त-परंपराओं और संस्मरणों के रूप में देखना उचित है।

11 सितंबर 1973 को हुआ महाप्रयाण

नीम करोली बाबा ने 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में देह त्याग किया। उनके अंतिम समय से जुड़ी जानकारी के अनुसार, स्वास्थ्य खराब होने के बाद उन्हें वृंदावन के अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका निधन हुआ। उनकी समाधि वृंदावन आश्रम परिसर में है। 

बाबा के देह त्याग के बाद भी कैंची धाम में उनकी आध्यात्मिक उपस्थिति में विश्वास रखने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती गई।

आज क्यों खास है कैंची धाम?

आज कैंची धाम केवल एक मंदिर या आश्रम नहीं, बल्कि भक्ति, सेवा और आध्यात्मिक साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। उत्तराखंड सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार, यह स्थान देश-विदेश से आने वाले आध्यात्मिक यात्रियों को आकर्षित करता है। 

हाल के वर्षों में इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। अक्टूबर 2026 में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ में उल्लेखनीय वृद्धि की खबरें सामने आई हैं, जिसके चलते प्रशासन भीड़ प्रबंधन और ऑनलाइन पंजीकरण जैसी व्यवस्थाओं पर विचार कर रहा है। 

संक्षेप में

नीम करोली बाबा का जीवन बाहरी आडंबर से अधिक प्रेम, भक्ति और सेवा पर केंद्रित था। नैनीताल की पहाड़ियों में उनके द्वारा स्थापित कैंची धाम आज उनकी इसी विचारधारा का प्रमुख केंद्र है। हर साल हजारों-लाखों श्रद्धालु यहां हनुमान जी के दर्शन के साथ महाराज जी की स्मृति से जुड़ने पहुंचते हैं।

कैंची धाम की सबसे बड़ी पहचान यही मानी जाती है—हनुमान भक्ति, सेवा और “सबसे प्रेम” का संदेश।

Advertisement
यह भी पढ़ें :  आज का राशिफल : 6 अक्टूबर 2026

You missed

❌ Content Protection Enabled: Right-click & text copying is disabled on this website.