नैनीताल – उक्रांद के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व विधायक डॉ. नारायण सिंह जंतवाल का निधन, पार्थिव शरीर नैनीताल पहुंचा
दिल्ली में उपचार के दौरान ली अंतिम सांस, देर शाम नैनीताल पहुंचा पार्थिव शरीर; कल रानीबाग चित्रशिला घाट पर होगा अंतिम संस्कार
रिपोर्टर गुड्डू सिंह ठठोला
नैनीताल। उत्तराखंड की राजनीति और पृथक राज्य आंदोलन के लिए शनिवार का दिन बेहद दुखद रहा। उत्तराखंड क्रांति दल के पूर्व अध्यक्ष, पूर्व विधायक एवं पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन के अग्रणी नेता डॉ. नारायण सिंह जंतवाल का शनिवार सुबह दिल्ली में आकस्मिक निधन हो गया। उनके निधन की खबर से नैनीताल सहित पूरे कुमाऊं क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। वह करीब 66 वर्ष के थे। देर शाम उनका पार्थिव शरीर नैनीताल स्थित उनके आवास पर पहुंचा, जहां बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों, राज्य आंदोलनकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और नगर के गणमान्य लोगों ने पहुंचकर उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की।
प्राप्त जानकारी के अनुसार डॉ. जंतवाल स्वास्थ्य संबंधी जांचों के लिए दिल्ली गए हुए थे। इसी दौरान अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। चिकित्सकों के प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका और उन्होंने अंतिम सांस ली। देर शाम उनका पार्थिव शरीर नैनीताल स्थित आवास पर पहुंचा। यहां शोकाकुल परिजनों और शुभचिंतकों ने उनके अंतिम दर्शन किए। इसके बाद पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव जंतवाल, भीमताल ले जाया जाएगा। रविवार सुबह रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
डॉ. नारायण सिंह जंतवाल उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे और उन्होंने पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर लंबे समय तक संघर्ष किया। राज्य आंदोलन के दौरान उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। उन्होंने वन आंदोलन, नशा नहीं-रोजगार दो आंदोलन और पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन में बढ़-चढ़कर भागीदारी की। आंदोलन के दौरान उन्होंने भूख हड़ताल की और अपने संघर्ष के चलते जेल भी गए। राज्य निर्माण के लिए उनका समर्पण और पहाड़ के जनसरोकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता हमेशा याद की जाएगी।
2002 में बने थे नैनीताल से विधायक
राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 में हुए उत्तराखंड के पहले विधानसभा चुनाव में डॉ. जंतवाल ने नैनीताल विधानसभा सीट से उत्तराखंड क्रांति दल के टिकट पर चुनाव लड़ा और विधायक निर्वाचित हुए। उन्होंने विधानसभा में क्षेत्रीय समस्याओं और उत्तराखंड के मूलभूत सवालों को प्रमुखता से उठाया। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में उन्हें बेहद कम मतों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद वर्ष 2012 में नैनीताल विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई।
डॉ. जंतवाल ने डीएसबी परिसर नैनीताल से शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने पीएचडी और कानून की डिग्री हासिल की। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने नैनीताल जिला न्यायालय के साथ ही उत्तराखंड हाईकोर्ट में भी वकालत की। राजनीति, सामाजिक आंदोलन और कानून के क्षेत्र में उनकी सक्रियता ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई।
डॉ. जंतवाल के निधन की सूचना मिलते ही नगर के विभिन्न क्षेत्रों से लोग उनके आवास पर पहुंचने लगे। अंतिम दर्शन कर श्रद्धांजलि देने वालों में नगर पालिका अध्यक्ष डॉ. सरस्वती खेतवाल, प्रो. ललित तिवारी, प्रो. अनीता बोरा, राज्य आंदोलनकारी पप्पन जोशी, व्यापार मंडल अध्यक्ष किशन नेगी, श्री राम सेवक सभा के अध्यक्ष मनोज लाल शाह, मनोज जोशी, विमल शाह, त्रिभुवन सिंह फर्त्याल, डॉ. अनिरुद्ध गंगोला, राज्य आंदोलनकारी शेखर पाठक, राज्य आंदोलनकारी राजीव लोचन शाह, रंगकर्मी मिथिलेश पांडे, मनमोहन कनवाल, राज्य आंदोलनकारी मुन्नी तिवारी और पूरन मेहरा सहित अनेक गणमान्य लोग शामिल रहे।
डॉ. नारायण सिंह जंतवाल के निधन पर उत्तराखंड क्रांति दल के नेताओं और राज्य आंदोलनकारियों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि डॉ. जंतवाल का निधन केवल उत्तराखंड क्रांति दल के लिए ही नहीं, बल्कि नैनीताल नगर, कुमाऊं क्षेत्र और पूरे उत्तराखंड के लिए अपूरणीय क्षति है।
एक ऐसे दौर में जब पृथक राज्य की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे लोगों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था, डॉ. जंतवाल ने आंदोलन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को उत्तराखंड के इतिहास, अस्मिता और जनहित के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देता रहेगा।
डॉ. जंतवाल अपने पीछे पत्नी और दो पुत्रियों को छोड़ गए हैं।
उनके निधन से क्षेत्र ने एक अनुभवी राजनेता, समर्पित राज्य आंदोलनकारी, शिक्षित विधिवेत्ता और सरल हृदय व्यक्तित्व को खो दिया है। नैनीताल में उनके निधन से हर आंख नम है और उनके योगदान को लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा।














