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नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. ललित तिवारी ने दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित रिफ्रेशर कोर्स में “औषधीय पौधे एवं संभावनाएं” विषय पर व्याख्यान दिया।

डॉ. तिवारी ने कहा कि औषधीय पौधों के बिना मानव जीवन सुरक्षित नहीं है। उन्होंने बताया कि सुमेरियन सभ्यता से शुरू हुई औषधीय पौधों की परंपरा को एबर्स पापायरस और सुश्रुत संहिता जैसे ग्रंथों ने आगे बढ़ाया। वर्तमान में विश्व में 50 से 70 हजार औषधीय एवं एरोमेटिक पौधे उपलब्ध हैं, जिनमें से 960 पौधे हाई ट्रेड श्रेणी में शामिल हैं। वर्ष 2025 में औषधीय पौधों का वैश्विक कारोबार 450 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है।

उन्होंने कहा कि भारत, चीन के बाद औषधीय पौधों के निर्यात में दूसरा सबसे बड़ा देश है। पारंपरिक ज्ञान से लेकर आधुनिक चिकित्सा पद्धति तक इन पौधों का व्यापक उपयोग किया जा रहा है। उत्तराखंड में लगभग 250 औषधीय पौधे व्यापारिक उपयोग में लाए जाते हैं। अतीश, अजवाइन, सत्वा, अग्नि, लगली, कुठ, हत्याजारी, मैदा, महा मैदा, नीर, बज्रदंती, हरड़ और किलमोरा जैसे पौधे आज भी अपनी उपयोगिता के कारण प्रसिद्ध हैं।

डॉ. तिवारी ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2050 तक औषधीय पौधों का कारोबार 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है तथा इसमें प्रतिवर्ष लगभग 7 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। उन्होंने ईसबगोल, तुलसी, मकई, कुमारी, सोन पत्ता, अश्वगंधा और वासा की खेती को महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने औषधीय पौधों के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि अष्टवर्ग के पांच पौधे एंडेंजर्ड श्रेणी में पहुंच चुके हैं। संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ सहित विभिन्न संस्थाओं द्वारा किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जंगलों में इन पौधों को बचाने के साथ-साथ खेती के माध्यम से किसानों को लाभ पहुंचाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में औषधीय पौधों की खेती की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन जंगली जानवरों की बढ़ती समस्या किसानों को हतोत्साहित करती है। इस अवसर पर संयोजक डॉ. आर.एस. चौहान सहित विभिन्न प्रदेशों के प्राध्यापक उपस्थित ने। 

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