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पर्वतीय कृषि संकट पर बड़ा शोध, पिथौरागढ़ में पलायन रोकने के लिए सुझाए ठोस उपाय

91% परिवार कृषि पर निर्भर, फिर भी खेती संकट में—आरती जोशी के शोध में सामने आई चिंताजनक तस्वीर

जलवायु परिवर्तन, जंगली जानवर और सिंचाई संकट से जूझ रही पर्वतीय खेती, शोध में मिले समाधान

पिथौरागढ़। महात्मा ज्योतिबा फुले रोहिलखंड विश्वविद्यालय, बरेली के क्षेत्रीय अर्थशास्त्र विभाग की शोधार्थिनी आरती जोशी ने अपने शोध “Review and Suitable Solutions to the Problems in Agriculture Hilly Area with Special Reference to Pithoragarh District” के माध्यम से पिथौरागढ़ जनपद के पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि संकट और उससे बढ़ते पलायन की गंभीर तस्वीर प्रस्तुत की है। यह शोध सहायक आचार्य डॉ. रुचि द्विवेदी के निर्देशन में पूरा किया गया।

शोध के अंतर्गत पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट और बेरीनाग विकासखंडों के 300 किसानों का सर्वेक्षण किया गया। अध्ययन में पर्वतीय कृषि की वर्तमान स्थिति, किसानों की प्रमुख समस्याओं और पलायन के कारणों का विस्तृत विश्लेषण किया गया।

शोध में सामने आया कि 91 प्रतिशत परिवारों का मुख्य व्यवसाय कृषि एवं पशुपालन है, लेकिन अधिकांश किसान सीमांत श्रेणी के हैं। 82.33 प्रतिशत किसानों के पास आधे एकड़ से भी कम भूमि है, जबकि 63 प्रतिशत किसान पूरी तरह वर्षा आधारित खेती पर निर्भर हैं। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, बढ़ते तापमान, कृषि योग्य भूमि में कमी, छोटी एवं बिखरी जोतें तथा खेती की लगातार बढ़ती लागत ने पर्वतीय कृषि को गंभीर संकट में डाल दिया है।

अध्ययन के अनुसार 78.6 प्रतिशत किसानों को कृषि ऋण नहीं मिल पाता, जबकि 82 प्रतिशत किसानों ने खेती की लागत को अत्यधिक बताया। इसके अलावा 84 प्रतिशत किसानों ने सड़क और आधारभूत ढांचे की कमी, 54.6 प्रतिशत ने सिंचाई सुविधाओं के अभाव तथा 54.7 प्रतिशत ने कोल्ड स्टोरेज और भंडारण सुविधाओं की कमी को खेती की प्रमुख बाधाएं बताया।

शोध में यह भी सामने आया कि 90 प्रतिशत किसानों की फसलें जंगली सूअर और बंदरों से प्रभावित होती हैं, जबकि 88 प्रतिशत किसानों ने कीट प्रकोप को बड़ी समस्या बताया। अध्ययन क्षेत्र के 62.3 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा से नीचे पाए गए और अधिकांश परिवारों को कृषि के साथ अन्य आय स्रोतों पर भी निर्भर रहना पड़ता है।

शोधार्थिनी आरती जोशी ने निष्कर्ष निकाला कि कृषि की घटती लाभप्रदता के कारण पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन लगातार बढ़ रहा है। इससे गांव खाली हो रहे हैं, कृषि उत्पादन घट रहा है और कई पारंपरिक फसलें विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं। अध्ययन में पाया गया कि 62 प्रतिशत प्रवासी बेहतर रोजगार की तलाश में राज्य से बाहर गए, जिनमें 68.7 प्रतिशत को स्थायी रोजगार प्राप्त हुआ।

शोध में पर्वतीय कृषि को पुनर्जीवित करने के लिए कई व्यवहारिक सुझाव दिए गए हैं। इनमें सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, सड़क एवं विपणन अवसंरचना का विकास, कोल्ड स्टोरेज और गोदामों की स्थापना, किसानों को आसान कृषि ऋण उपलब्ध कराना, सरकारी योजनाओं की प्रभावी जानकारी और समय पर लाभ, जलवायु अनुकूल कृषि तकनीकों का प्रसार, जंगली जानवरों से फसल सुरक्षा, पारंपरिक एवं उच्च मूल्य वाली फसलों को बढ़ावा तथा स्थानीय स्तर पर कृषि आधारित रोजगार के अवसर विकसित करना प्रमुख हैं।

शोध के अनुसार यदि इन सुझावों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए तो पर्वतीय कृषि को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।

इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी, ग्रामीण आजीविका मजबूत होगी और पलायन जैसी गंभीर समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकेगा।

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