नैनीताल। सरोवर नगरी नैनीताल में शनिवार को जनकवि गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ की 16वीं पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। इस मौके पर शहर के रंगकर्मियों और गिर्दा के प्रशंसकों ने जुलूस निकालकर जनकवि को नमन किया।
मालरोड पर निकले जुलूस के दौरान गिर्दा के जनगीतों और रचनाओं की गूंज सुनाई दी। लोगों ने उनकी कविताओं और गीतों को याद करते हुए उनके विचारों को आज के दौर में भी प्रासंगिक बताया।
गिर्दा की पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रमों में उनके साहित्य, जनसरोकारों और उत्तराखंड के सामाजिक आंदोलनों में उनकी भूमिका को विशेष रूप से याद किया गया। रंगकर्मियों ने कहा कि गिर्दा ने अपनी लेखनी को सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आम जनता की आवाज बनाया। उनके गीतों में पहाड़ के लोगों का दर्द, संघर्ष, सपने और अपने हक-हकूक के लिए उठने वाली आवाज साफ तौर पर दिखाई देती है।
मालरोड पर गूंजे गिर्दा के जनगीत
पुण्यतिथि के अवसर पर नैनीताल के रंगकर्मियों ने नगर में जुलूस निकाला। इस दौरान मालरोड गिर्दा की रचनाओं और जनगीतों से गूंज उठी। जुलूस में शामिल लोगों ने गिर्दा के गीत गाकर और उनकी स्मृतियों को साझा कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। माहौल में भावुकता के साथ-साथ जनकवि के विचारों को आगे बढ़ाने का संकल्प भी दिखाई दिया।
‘गिर्दा को सलाम’ कार्यक्रम में हुई विचार गोष्ठी
सीआरएसटी इंटर कॉलेज के जगदीश साह प्रेक्षागृह में ‘गिर्दा को सलाम’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में ‘आज के दौर में गिर्दा की प्रासंगिकता’ विषय पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने गिर्दा के साहित्य और उनके जनसरोकारों पर विस्तार से विचार रखे।
कार्यक्रम में हृदयेश जोशी, राहुल कोटियाल, पीसी तिवारी और जनकवि बलबीर सिंह चीमा समेत कई वक्ताओं ने गिर्दा की रचनात्मक यात्रा और उनके सामाजिक सरोकारों को याद किया। वक्ताओं ने कहा कि गिर्दा की रचनाएं केवल एक दौर का दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि आज भी समाज के सामने मौजूद कई सवालों को आवाज देती हैं।
उत्तराखंड आंदोलन में निभाई अहम भूमिका
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ का योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 1994 के राज्य आंदोलन के दौरान उनके जनगीतों और कविताओं ने आंदोलनकारियों के बीच नई ऊर्जा पैदा करने का काम किया। उन्होंने पहाड़ के जनमानस की भावनाओं और समस्याओं को अपने गीतों में पिरोकर अलग राज्य की मांग को व्यापक जनभावना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गिर्दा के गीत आंदोलनकारियों के लिए केवल गीत नहीं थे, बल्कि संघर्ष की आवाज बन गए थे। उनके शब्दों ने लोगों को अपने अधिकारों, पहाड़ की अस्मिता और सामाजिक न्याय के सवालों पर आवाज बुलंद करने की प्रेरणा दी।
राज्य बनने के बाद भी जनआंदोलनों से जुड़े रहे
उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद भी गिर्दा जनसरोकारों से दूर नहीं हुए। उन्होंने विभिन्न सामाजिक और जनआंदोलनों में अपनी सक्रिय भागीदारी बनाए रखी। उनकी रचनाओं में पहाड़ के गांवों से लेकर आम आदमी की परेशानियों और व्यवस्था से जुड़े सवालों तक को जगह मिली।
गिर्दा का मानना था कि साहित्य और कला का समाज के प्रति भी दायित्व होता है। यही वजह रही कि उनकी कविताएं और जनगीत आम लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हुए और वह उत्तराखंड की जनसंस्कृति के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर बन गए।
22 अगस्त 2010 को खामोश हुई थी आवाज
जनकवि गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ का 22 अगस्त 2010 को निधन हुआ था। उनके निधन को उत्तराखंड के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के लिए बड़ी क्षति माना गया। हालांकि, उनके जाने के 16 वर्ष बाद भी उनकी रचनाएं लोगों के बीच जीवंत हैं।
गिर्दा की लेखनी आज भी पहाड़ की पीड़ा, संघर्ष और उम्मीद को आवाज देती है। उनके गीतों में दिखाई देने वाले जनसरोकार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। यही कारण है कि उनकी पुण्यतिथि पर नैनीताल में आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम केवल एक स्मरण कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि उनकी विचारधारा और जनगीतों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी बना।
गिर्दा भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गीत, कविताएं और विचार उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना में आज भी जीवित हैं। उनकी रचनाएं लोगों को अपने हक-हकूक, सामाजिक न्याय और जनसरोकारों के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा देती रहेंगी।









