नैनीताल। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर स्थित विजिटिंग प्रोफेसर निदेशालय एवं संस्कृत विभाग के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय ज्ञान परम्परा और शैवदर्शन” विषय पर गरिमामयी एवं ज्ञानवर्धक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं छात्र-छात्राओं की उल्लेखनीय सहभागिता रही।
कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन एवं मंगलाचरण के साथ हुआ। विजिटिंग प्रोफेसर निदेशालय की ओर से डॉ. हेम चन्द्र जोशी ने निदेशक प्रो. ललित तिवारी के निर्देशानुसार कार्यक्रम की रूपरेखा एवं उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया।
संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. लज्जा भट्ट ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व मानवता के लिए प्रेरणा और नैतिक मार्गदर्शन का अक्षय स्रोत रही है। उन्होंने संस्कृत साहित्य को भारतीय संस्कृति की आत्मा बताते हुए इसके संरक्षण एवं संवर्धन पर बल दिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. एच.सी.एस. बिष्ट तथा विशिष्ट अतिथि प्रो. आशीष तिवारी रहे। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. राजमंगल यादव ने भारतीय ज्ञानपरम्परा की दार्शनिक गम्भीरता एवं शैवदर्शन की आध्यात्मिक चेतना पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन केवल सैद्धान्तिक चिंतन नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, नैतिक एवं मूल्यनिष्ठ बनाने वाली जीवनदृष्टि है।
उन्होंने विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों से भारतीय ज्ञानपरम्परा के मूल स्रोतों का गंभीर अध्ययन कर भारतीय संस्कृति के वैश्विक स्वरूप को समझने का आह्वान किया। कार्यक्रम का संचालन शोधछात्रा भावना कांडपाल ने किया।
समापन अवसर पर डॉ. प्रदीप कुमार ने सभी अतिथियों, विद्वानों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में डॉ. नीता आर्या, डॉ. सुषमा जोशी, प्रो. रीना सिंह, प्रो. लता पांडे, प्रो. अनीत पांडे, प्रो. दीपक पालीवाल, डॉ. गगन, डॉ. मनोज बाफिला, डॉ. नवीन पाण्डे, डॉ. हर्ष सहित विश्वविद्यालय के अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के सफल आयोजन में डॉ. हर्ष एवं उनकी टीम का विशेष सहयोग रहा। अंत में हर्षित जोशी एवं संजय जोशी द्वारा प्रस्तुत शान्तिपाठ के साथ संगोष्ठी का समापन हुआ।

