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नैनीताल। जब प्रोफेसर सेमिनार, कार्यशालाओं या सम्मेलनों में भाग लेते हैं, तो कुछ लोग तुरंत कह देते हैं, “अरे, ये तो बस अपना सीवी भरने के लिए कर रहे हैं!” लेकिन ऐसा सोचना वैसा ही है जैसे यह मान लेना कि पेड़ सिर्फ दिखावा करने के लिए पत्ते उगाता है।

हकीकत में, ये शैक्षिक गतिविधियां सिर्फ प्रोफेसर के लिए नहीं, बल्कि छात्रों और पूरे संस्थान के लिए भी फायदेमंद होती हैं।

इन कार्यक्रमों में भाग लेकर प्रोफेसर नए विचार, शोध और शिक्षण तकनीकों से परिचित होते हैं। जब वे ये ज्ञान अपनी कक्षाओं में लाते हैं, तो छात्रों को पुराने किताबों से आगे बढ़कर विषयों को व्यावहारिक और आधुनिक दृष्टिकोण से समझने का मौका मिलता है।

एक ऐसा प्रोफेसर जो स्वयं लगातार सीख रहा हो, वह अपने छात्रों को भी नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है।

सेमिनार और सम्मेलनों से प्रोफेसरों को विशेषज्ञों से जुड़ने का मौका मिलता है, जिससे सहयोग के नए रास्ते खुलते हैं। ये सहयोग छात्रों के लिए शोध प्रोजेक्ट, इंटर्नशिप और अन्य अवसरों का द्वार खोल सकते हैं।

सोचिए, अगर एक प्रोफेसर के नेटवर्किंग से छात्रों को आधुनिक शोध का हिस्सा बनने का मौका मिले, तो यह कितनी बड़ी बात होगी!

इसके अलावा, जब प्रोफेसर अपने कॉलेज या विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो यह पूरे संस्थान की प्रतिष्ठा को बढ़ाता है। इस बढ़ती साख से छात्रों, शिक्षकों और यहां तक कि स्थानीय समुदाय को भी लाभ मिलता है।

और जो लोग यह सोचते हैं कि प्रोफेसर सिर्फ “अंक जुटाने” के लिए यह सब करते हैं, उनके लिए हल्के-फुल्के अंदाज में कहना चाहूंगा कि ऐसा मानना वैसा ही है जैसे यह सोचना कि कोई धावक सिर्फ पदक के लिए दौड़ता है, न कि फिटनेस, दृढ़ता और दूसरों को प्रेरित करने के लिए।

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