बागेश्वर। बिजोरीझाल में स्थित मां भगवती का भव्य मंदिर अब स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। इस मंदिर में सालभर धार्मिक गतिविधियां होती रहती हैं, लेकिन खासकर शारदीय नवरात्रों के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

मंदिर में नवरात्रों के दौरान अखण्ड ज्योति प्रज्वलित की जाती है और प्रतिदिन भोग का आयोजन होता है। इसके साथ ही सामूहिक रूप से हरेला पर्व भी बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

नवरात्रों के दौरान यहां विशेष रूप से बैंस और सौपाती पूजन का आयोजन किया जाता है, जिसमें लाटू देव और छुरमल देव का ‘नर बदन’ में अवतार होने की मान्यता है। इस अद्भुत धार्मिक परंपरा के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

रोचक है मंदिर की स्थापना का इतिहास

मंदिर की स्थापना को लेकर स्थानीय लोगों और पूर्वजों की मान्यताएं बेहद रोचक हैं। बताया जाता है कि ऐठानी परिवार, जो कपकोट क्षेत्र के ऐठाण पोथिंग से यहां आकर धरैगैर में बसा था, उसी परिवार की एक वृद्ध महिला (आमा) के शरीर में भगवती का अवतार हुआ।

भगवती ने भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि जहां पांच दाने चावल (अक्षत) मिलेंगे, वहां मंदिर का निर्माण होगा और जहां तीन दाने चावल मिलेंगे, वहां धुनी स्थापित की जाएगी। गांववासियों ने खोजबीन की तो लगभग 200 से 300 मीटर की दूरी पर बताए गए स्थानों पर चावल के दाने मिले। इसके बाद पूर्वजों ने उन्हीं स्थानों पर मंदिर और धुनी की स्थापना की।

पूर्वजों के प्रयासों से हुआ मंदिर का विकास

इस मंदिर के प्रारंभिक सौंदर्यीकरण का कार्य स्वर्गीय दरबान सिंह द्वारा ग्रामीणों के सहयोग से किया गया। समय के साथ स्थानीय लोगों के प्रयासों से मंदिर को और अधिक भव्य और सुसज्जित बनाया गया।

मंदिर परिसर में देवी नन्दा, देवी काली, लाटू देव और भैरव देव विराजमान हैं, जो इसे एक समृद्ध धार्मिक स्थल बनाते हैं। मंदिर के प्रमुख पुजारी सुरेश उप्रेती के अनुसार, मंदिर के सौंदर्यीकरण और विकास में स्थानीय जनता, महिलाओं, समाजसेवियों और श्रद्धालुओं का बराबर योगदान रहा है। यह सहयोग देवी के प्रति आस्था और मनोकामनाओं की पूर्ति का प्रतीक माना जाता है।

आस्था और परंपरा का जीवंत उदाहरण

बिजोरीझाल का मां भगवती मंदिर आज न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यहां की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का भी जीवंत उदाहरण बन चुका है। हर वर्ष यहां आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठान और मेले क्षेत्र की पहचान को और मजबूत कर रहे हैं।

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