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उत्तराखंड के जंगलों में एक बार फिर आग की घटनाएं तेजी से बढ़ने लगी हैं। वर्ष 2026 में रुद्रप्रयाग में 20 घटनाएं सामने आई हैं, जबकि अल्मोड़ा के लोधिया, नैनीताल के गेठिया और गंगोलीहाट क्षेत्र के जंगलों में भी आग भड़क उठी है।

इन घटनाओं में अब तक करीब 41 एकड़ वन क्षेत्र प्रभावित हो चुका है।

हिमालयी राज्यों में अब शीतकाल के बाद ग्रीष्मकालीन मौसम में जंगलों में आग लगने का सिलसिला आम होता जा रहा है। इस आग से न केवल अनगिनत पेड़-पौधे और दुर्लभ वनस्पतियां नष्ट हो रही हैं, बल्कि वन्यजीव भी अपने प्राकृतिक आवास से बेघर हो रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, जंगल कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण संतुलन बनाए रखते हैं, लेकिन आग लगने पर यही जंगल बड़ी मात्रा में संचित कार्बन और जहरीली गैसें वातावरण में छोड़ देते हैं, जिससे ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा मिलता है।

जंगल की आग से निकलने वाला धुआं स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है। इससे पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक बढ़ते हैं, जो सांस और हृदय संबंधी बीमारियों का कारण बनते हैं। साथ ही आग की तीव्र गर्मी से मिट्टी के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे भूमि बंजर होने लगती है और कटाव बढ़ जाता है।

आर्थिक दृष्टि से भी इसका असर गंभीर है। लकड़ी के भंडार, फसलें और बिजली जैसी बुनियादी संरचनाएं नष्ट हो जाती हैं। जल स्रोत सूखने लगते हैं और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है।

जानकारों का मानना है कि जंगल की अधिकांश आग मानवीय लापरवाही, जैसे जलती सिगरेट या बीड़ी फेंकने और जानबूझकर आग लगाने के कारण होती है। वहीं जलवायु परिवर्तन के चलते आग का मौसम लंबा हो रहा है और इसकी तीव्रता भी बढ़ रही है।

हालांकि कुछ परिस्थितियों में वन अग्नि प्राकृतिक पुनर्जनन में सहायक हो सकती है, लेकिन वर्तमान समय में इससे होने वाला नुकसान कहीं अधिक गंभीर है। यह जैव विविधता के ह्रास, भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण जैसी समस्याओं को बढ़ावा दे रही है।

सरकार द्वारा वन अग्नि निवारण एवं प्रबंधन (FPM) योजना के तहत विभिन्न उपाय किए जा रहे हैं, जिनमें सैटेलाइट निगरानी, हेलीकॉप्टर की मदद और प्रशिक्षित मानव संसाधन की तैनाती शामिल है। बावजूद इसके, बढ़ती घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि जंगलों को बचाने के लिए और अधिक ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

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