राजू भाई, राजेंद्र सिंह ढेला और नवीन जोशी के नेतृत्व में चला वृक्षारोपण अभियान, पौधों के संरक्षण का भी लिया संकल्प
नैनीताल। चोसला वन (उत्तराखंड)।पर्यावरण संरक्षण और हरित उत्तराखंड के निर्माण के उद्देश्य से चोसला वन क्षेत्र में एक वृहद् वृक्षारोपण अभियान का आयोजन किया गया।
इस अभियान में कुमाऊं की लोकप्रिय सांस्कृतिक टीम ‘घुघूति जागर’ के प्रमुख सदस्यों और टाटा परिवार के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी करते हुए बड़ी संख्या में पौधे रोपे।
कार्यक्रम का उद्देश्य केवल पौधारोपण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लगाए गए पौधों के संरक्षण और उनकी नियमित देखभाल का संकल्प भी सभी प्रतिभागियों ने लिया।
अभियान के दौरान टीम घुघूति जागर के प्रमुख सदस्य राजू भाई, राजेंद्र सिंह ढेला और नवीन जोशी ने टाटा परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर चोसला वन में विभिन्न प्रजातियों के छायादार, फलदार और पर्यावरण के लिए उपयोगी पौधों का रोपण किया।
सभी ने सामूहिक रूप से प्रकृति संरक्षण का संदेश देते हुए हर व्यक्ति से अधिक से अधिक पौधे लगाने और उनकी जिम्मेदारी निभाने की अपील की।
इस अवसर पर राजू भाई और राजेंद्र सिंह ढेला ने कहा कि “प्रकृति ही जीवन का आधार है। उत्तराखंड की हरियाली और प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
टाटा परिवार के साथ मिलकर किया गया यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”
वहीं नवीन जोशी और टाटा परिवार के प्रतिनिधियों ने युवाओं से आह्वान किया कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कम से कम एक पौधा अवश्य लगाए और उसकी देखभाल अपने परिवार के सदस्य की तरह करे। उनका कहना था कि वृक्ष केवल पर्यावरण को संतुलित नहीं रखते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की भी नींव हैं।
लोक संस्कृति के माध्यम से समाज को जागरूक करने वाली घुघूति जागर टीम को पर्यावरण संरक्षण जैसे सामाजिक अभियान में सक्रिय भूमिका निभाते देख स्थानीय लोगों में भी उत्साह का माहौल रहा। कई लोगों ने भविष्य में ऐसे अभियानों से जुड़ने की इच्छा जताई।
कार्यक्रम में टाटा परिवार के अधिकारियों, कर्मचारियों और स्थानीय नागरिकों ने पूरे जोश के साथ भाग लिया। हाथों में पौधे और कुदाल लेकर सभी ने हरियाली बढ़ाने का संकल्प दोहराया।
सामूहिक वृक्षारोपण के साथ लिया गया यह संकल्प इस बात का प्रतीक बना कि जब समाज, संस्कृति और कॉर्पोरेट जगत एक साथ आते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़े बदलाव संभव हो जाते हैं।


