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नैनीताल। नैनी झील में लगभग 30 वर्षों से विलुप्त हो चुकी स्नो ट्राउट (स्थानीय नाम ‘असेला’) मछली की प्रजाति को पुनः स्थापित करने की महत्वपूर्ण पहल की गई।

इस अवसर पर कुमाऊं आयुक्त एवं मुख्यमंत्री सचिव दीपक कुमार, नगरपालिका अध्यक्ष डॉ. सरस्वती खेतवाल सहित अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे।

कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दीवान एस. रावत की प्रेरणा से जन्तु विज्ञान विभाग द्वारा इस प्रजाति के संरक्षण का कार्य किया गया। विभागाध्यक्ष एवं प्रधान अन्वेषक प्रो. बिष्ट तथा सह-अन्वेषक डॉ. सीता देवली के प्रयासों से प्रयोगशाला में आर्टिफिशियल स्पॉनिंग (ए.ए.एस.) पद्धति के माध्यम से स्नो ट्राउट के मत्स्य बीज तैयार किए गए। इसके तहत 300 अंगुलिकाओं को नैनी झील में केज के माध्यम से छोड़ा गया।

इस मौके पर आयुक्त दीपक कुमार ने इसे सराहनीय पहल बताते हुए कहा कि इससे नैनी झील का पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) बेहतर होगा। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलसचिव, डीएसबी परिसर के प्रभारी निदेशक, अधिष्ठाता छात्र कल्याण सहित कई प्राध्यापक, शोधार्थी और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

विशेषज्ञों के अनुसार स्नो ट्राउट ठंडे और स्वच्छ जल में पाई जाने वाली मछली है, जो 0 से 20 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले जल स्रोतों में ही जीवित रह सकती है। पूरे भारत में इसकी लगभग 24 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 4 प्रजातियां कुमाऊं क्षेत्र में मिलती हैं।

1990 के दशक तक नैनीताल, भीमताल, नौकुचियाताल और सातताल में यह प्रजाति सामान्य रूप से पाई जाती थी, लेकिन मानव जनित दबाव और जल पारिस्थितिक असंतुलन के कारण यह धीरे-धीरे विलुप्त हो गई।

स्नो ट्राउट को बायो-इंडिकेटर भी माना जाता है, जो जल की गुणवत्ता को दर्शाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि झीलों में यूट्रोफिकेशन बढ़ने पर यह प्रजाति सबसे पहले समाप्त होती है। हाल ही में बायो-मैग्निफिकेशन परियोजना के तहत झील से विदेशी प्रजातियों को हटाया गया है, जिससे अब जल में ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन, पोटेशियम और फॉस्फोरस का संतुलन इस प्रजाति के लिए अनुकूल हुआ है।

पोषण की दृष्टि से भी स्नो ट्राउट महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इसमें प्रोटीन और ओमेगा-3 फैटी एसिड प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

कार्यक्रम के अंत में अतिथियों को प्रतीक चिन्ह और पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया।

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