ब्रेकिंग न्यूज़

नैनीताल। वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रभाव हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से दिखाई देने लगे हैं।

इस संबंध में कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल में प्रस्तुत एक शोध में पाया गया है कि नैनीताल जिले के बलिया जलग्रहण क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का नकारात्मक असर स्थानीय जल संसाधनों पर स्पष्ट रूप से पड़ रहा है।

स. भ. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रुद्रपुर के भूगोल विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पूनम शाह गंगोला के निर्देशन में शोधार्थी वसीम अहमद ने अपने पीएचडी शोध प्रबंध “इंपैक्ट ऑफ क्लाइमेट चेंज ऑन वाटर रिसोर्सेस: ए केस स्टडी ऑफ बलिया कैचमेंट, डिस्ट्रिक्ट नैनीताल, उत्तराखंड” की अंतिम मौखिक परीक्षा के दौरान यह जानकारी दी।

शोध में बताया गया कि बलिया नदी (बलिया नाला) जलग्रहण क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव दिखाई दे रहे हैं। यहां के प्राकृतिक जल स्रोत यानी धारे और नौले तेजी से सूख रहे हैं। अध्ययन के अनुसार क्षेत्र के लगभग 19 प्रतिशत जल स्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं, जबकि करीब 24 प्रतिशत मौसमी हो गए हैं। इसके अलावा बलिया नदी और इसकी प्रमुख सहायक नदियां कुरियागाड़ और नलेनागाड़ में भी जलस्तर लगातार घट रहा है। स्थानीय रूप से सिमार और गजार कहलाने वाली आर्द्रभूमियां भी सिकुड़ती जा रही हैं।

शोध में यह भी पाया गया कि क्षेत्र में तापमान लगातार बढ़ रहा है और वर्षा का स्वरूप भी बदल रहा है। अब वर्षा कम दिनों में और अतिवृष्टि के रूप में हो रही है, जिससे चरम मौसमी घटनाएं बढ़ रही हैं। इसका असर क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, खाद्य सुरक्षा तथा कृषि गतिविधियों पर पड़ रहा है। जल संसाधनों में कमी के कारण कृषि, बागवानी और पशुपालन जैसे पारंपरिक व्यवसाय भी प्रभावित हो रहे हैं।

डॉ. वसीम अहमद ने अपने अध्ययन में चेतावनी दी कि यदि समय रहते जल संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन नहीं किया गया तो आने वाले समय में क्षेत्र में जल संकट और गंभीर हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि समुदाय आधारित जल संरक्षण और प्रबंधन प्रणाली विकसित की जाए, जिसमें पारंपरिक ज्ञान के साथ आधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हुए जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया जाए तथा रिचार्ज जोन चिन्हित कर उनका संरक्षण किया जाए।

शोध के बाह्य परीक्षक प्रोफेसर प्रवीन कुमार पाठक, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली ने अध्ययन को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि वर्तमान समय में जल संसाधनों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने इस विषय पर आगे और तकनीकी व सूक्ष्म अध्ययन की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला।

इस अवसर पर प्रोफेसर आर.सी. जोशी, डॉ. मनीषा त्रिपाठी, डॉ. मोहन लाल, डॉ. पी.सी. चन्याल, डॉ. विनीता, डॉ. देवेंद्र, डॉ. दीपक सहित कई शोधार्थी और शिक्षाविद उपस्थित रहे।

वहीं डॉ. ललित तेवारी ने वसीम अहमद को पीएचडी उपाधि प्राप्त करने पर बधाई और शुभकामनाएं दीं।

Advertisement
यह भी पढ़ें :  आज का राशिफल : 22 सितम्बर 2026

You missed

❌ Content Protection Enabled: Right-click & text copying is disabled on this website.