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ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष अमावस्या पर मनाया जाने वाला शनि जन्मोत्सव इस वर्ष 16 मई को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया के पुत्र शनिदेव का जन्म हुआ था। इस तिथि को शनिश्चरी अमावस्या भी कहा जाता है।

हिंदू धर्म में शनिदेव को न्याय के देवता और कर्मफलदाता माना जाता है। मान्यता है कि वे मनुष्य को उसके अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं।

शनिदेव को ग्रहों में सबसे कठोर लेकिन निष्पक्ष देवता माना गया है। वे किसी के साथ पक्षपात नहीं करते और व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुरूप फल देते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार शनिदेव का वर्ण श्याम है, वे नीले वस्त्र धारण करते हैं तथा गिद्ध या कौए की सवारी करते हैं। उनके हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल और गदा सुशोभित रहते हैं। वेदों में उन्हें ‘शनैश्चर’ कहा गया है, जिसका अर्थ है धीरे-धीरे चलने वाला।

शनिदेव के प्रमुख नामों में कोणस्थ, पिंगल, बभ्रु, कृष्ण, रौद्र, यम, सौरि, मंद, शनैश्चर और पिप्पलाद शामिल हैं। धार्मिक मान्यता है कि शनिवार के दिन व्रत, पूजा-अर्चना और “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र के जाप से शनि दोषों से राहत मिलती है। वहीं काले वस्त्र, तिल और लोहे का दान शनिदेव को प्रसन्न करने वाला माना जाता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब शनि किसी राशि के पहले, दूसरे या बारहवें भाव में गोचर करते हैं तो उसे साढ़ेसाती कहा जाता है, जबकि चौथे और आठवें भाव में होने को ढैय्या कहा जाता है। इन अवधियों में व्यक्ति को जीवन में संघर्ष और चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन इसे आत्मशुद्धि और जीवन के महत्वपूर्ण पाठ सीखने का समय भी माना जाता है।

धार्मिक विद्वानों के अनुसार शनिदेव व्यक्ति के विचारों, शब्दों और कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं।

उनकी कृपा से जीवन में अनुशासन, विनम्रता और न्याय की भावना विकसित होती है। श्रद्धालुओं ने प्रार्थना की कि शनिदेव सभी पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें और जीवन में सुख-समृद्धि प्रदान करें।

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