ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी भीमताल में ‘ग्रीन इनिशिएटिव्स एंड सस्टेनेबिलिटी’ पर संवाद, 200 से अधिक विद्यार्थियों ने लिया हिस्सा
पर्यावरण संरक्षण के साथ दैनिक जीवन में सतत आदतें अपनाने का संदेश, प्लास्टिक रीसाइक्लिंग, कचरा प्रबंधन और सर्कुलर इकोनॉमी पर हुई चर्चा
भीमताल। ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी, भीमताल कैंपस में बुधवार को ‘ग्रीन इनिशिएटिव्स एंड सस्टेनेबिलिटी’ विषय पर एक संवादात्मक सत्र का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के इको क्लब, राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC) और राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में 200 से अधिक विद्यार्थियों ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ उन्हें अपने दैनिक जीवन में सतत एवं पर्यावरण-अनुकूल आदतों को अपनाने के लिए प्रेरित करना रहा।
कार्यक्रम में पशुपति ग्रुप के डिप्टी जनरल मैनेजर (EHS एवं Sustainability) विमल रस्तोगी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। भीमताल कैंपस के निदेशक ने पौधा भेंट कर उनका स्वागत किया। पौधा भेंट करने की पहल को पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता के प्रतीक के रूप में देखा गया।
‘ग्रीन’ केवल रंग नहीं, जीवनशैली का हिस्सा
संवादात्मक सत्र की शुरुआत विमल रस्तोगी ने विद्यार्थियों से एक सवाल पूछते हुए की—“क्या ग्रीन केवल एक रंग है या इससे कहीं अधिक?” उन्होंने समझाया कि सस्टेनेबिलिटी केवल सरकारी नीतियों, औद्योगिक परियोजनाओं या पर्यावरण अभियानों तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध प्रत्येक व्यक्ति के रोजमर्रा के निर्णयों से है।
उन्होंने ऑनलाइन फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स में अत्यधिक पैकेजिंग, सिंगल-यूज प्लास्टिक बोतलों का इस्तेमाल, भोजन की बर्बादी और आवश्यकता से अधिक बिजली की खपत जैसे उदाहरणों के माध्यम से विद्यार्थियों को यह समझाने का प्रयास किया कि छोटी-छोटी दैनिक गतिविधियों का भी पर्यावरण पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
‘दूर फेंका गया कचरा आखिर जाता कहां है?’
सत्र के दौरान कचरा प्रबंधन को लेकर भी विद्यार्थियों के साथ संवाद किया गया। “जब हम किसी वस्तु को ‘दूर’ फेंकते हैं, तो वह ‘दूर’ आखिर कहां है?” जैसे सवाल के माध्यम से विद्यार्थियों को कचरे के निस्तारण के बाद की पूरी प्रक्रिया के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया गया।
वक्ताओं ने कचरे के उचित पृथक्करण और वैज्ञानिक प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया। बताया गया कि यदि घरों, संस्थानों और अन्य स्थानों पर कचरे को सही तरीके से अलग किया जाए तो उसके पुनर्चक्रण और संसाधन के रूप में दोबारा उपयोग की संभावनाएं बढ़ाई जा सकती हैं। वहीं, गलत तरीके से निस्तारित किया गया कचरा पर्यावरण के लिए अतिरिक्त चुनौतियां पैदा कर सकता है।

प्लास्टिक के RIC कोड की दी व्यावहारिक जानकारी
सत्र में प्लास्टिक रीसाइक्लिंग और रेजिन आइडेंटिफिकेशन कोड (RIC) के बारे में भी विद्यार्थियों को व्यावहारिक जानकारी दी गई। बताया गया कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक को सामान्यतः 1 से 7 तक के कोड के माध्यम से वर्गीकृत किया जाता है।
विद्यार्थियों को PET यानी टाइप-1 और HDPE यानी टाइप-2 जैसे प्लास्टिक के बारे में जानकारी दी गई, जिन्हें सामान्य तौर पर रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। वहीं पॉलीस्टाइरीन/स्टायरोफोम, मल्टीलेयर पैकेजिंग, सिंगल-यूज फिल्म और दूषित प्लास्टिक के प्रसंस्करण में आने वाली चुनौतियों पर भी चर्चा की गई।
विमल रस्तोगी ने बताया कि उचित रूप से अलग किए गए प्लास्टिक कचरे को यांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से श्रेड कर संसाधित किया जा सकता है और इससे कच्चे माल के रूप में रेजिन पेलेट्स प्राप्त किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रभावी कचरा पृथक्करण केवल औद्योगिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि घर और शैक्षणिक संस्थानों के स्तर पर भी जरूरी है।
जल और ऊर्जा संरक्षण पर भी जोर
कार्यक्रम के दौरान जल एवं ऊर्जा संरक्षण, उत्सर्जन नियंत्रण, कचरा पृथक्करण, रीसाइक्लिंग और संसाधन पुनर्प्राप्ति जैसी सतत औद्योगिक प्रक्रियाओं पर विस्तार से चर्चा हुई। विद्यार्थियों को संसाधनों के सीमित स्वरूप और उनके जिम्मेदार उपयोग के महत्व से अवगत कराया गया।
इस दौरान सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा को भी सरल तरीके से समझाया गया। बताया गया कि संसाधनों का दोबारा उपयोग, मरम्मत, पुनर्चक्रण और उनसे नए उपयोगी उत्पाद तैयार करना ‘उपयोग करो और फेंक दो’ की पारंपरिक व्यवस्था की तुलना में संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी
विमल रस्तोगी ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी किसी एक व्यक्ति, संस्था या विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह सभी की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने विद्यार्थियों से व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग को प्राथमिकता देने का आह्वान किया। साथ ही पर्यावरण संरक्षण के साथ संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के आर्थिक महत्व पर भी प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के अंत में प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया। इसमें विद्यार्थियों ने घर और कैंपस में पर्यावरण-अनुकूल आदतों को अपनाने, प्लास्टिक के सही निस्तारण, कचरा पृथक्करण और संसाधनों की बचत से जुड़े विभिन्न सवाल पूछे। वक्ता ने विद्यार्थियों के सवालों के जवाब देते हुए व्यवहारिक उपायों की जानकारी दी।
कार्यक्रम में इको क्लब, NCC और NSS के स्वयंसेवकों ने विश्वविद्यालय परिसर में हरित पहलों को आगे बढ़ाने तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
आयोजन ने विद्यार्थियों को यह संदेश दिया कि पर्यावरण संरक्षण केवल बड़े अभियानों का विषय नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में लिए जाने वाले छोटे और जिम्मेदार निर्णयों से भी इसकी शुरुआत की जा सकती है।






