नैनीताल में मां नंदा सुनंदा मूर्ति निर्माण पर अंतिम रूप दिया जा रहा है काल ब्रह्म मुहूर्त प्राण प्रतिष्ठा के साथ श्रद्धालु मां के दर्शन कर पाएंगे
रिपोर्टर गुड़डू सिंह ठठोला
नैनीताल। कुमाऊं की आराध्य एवं कुलदेवी मां नंदा-सुनंदा के ऐतिहासिक महोत्सव को लेकर नैनीताल में तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। महोत्सव के प्रमुख आकर्षण मां नंदा और सुनंदा की प्रतिमाओं को इस वर्ष भी पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए पूरी तरह इको फ्रेंडली सामग्री से तैयार किया जा रहा है।
प्रतिमा निर्माण में केले के पेड़ के तने, बांस, घास, रुई, कपड़े तथा प्राकृतिक रंगों समेत अन्य पर्यावरण प्रिय वस्तुओं का प्रयोग किया जा रहा है।
मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में कलाकार और सेवादार दिन-रात जुटे हुए हैं। प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया में इस बात का विशेष ध्यान रखा जा रहा है कि विसर्जन के बाद पर्यावरण को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे। प्राकृतिक एवं आसानी से नष्ट होने वाली सामग्री के प्रयोग से प्रतिमाओं को पर्यावरण अनुकूल स्वरूप दिया जा रहा है।
19 सितंबर को ब्रह्ममुहूर्त में होगी प्राण-प्रतिष्ठा
मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं को 19 सितंबर को ब्रह्ममुहूर्त में प्रतिष्ठा के बाद श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिया जाएगा। इसके बाद चार दिनों तक मां की विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे। इस दौरान नैनीताल सहित दूर-दराज क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां नंदा-सुनंदा के दर्शन के लिए पहुंचेंगे।
महोत्सव के अंतिम दिन 23 सितंबर को मां नंदा-सुनंदा का डोला नगर भ्रमण पर निकलेगा। नगर के विभिन्न मार्गों से होते हुए डोला देर सायं नैनीताल में ही विसर्जित किया जाएगा। इसके साथ ही मां नंदा-सुनंदा को विधि-विधान और भावपूर्ण माहौल में उनके मायके से ससुराल के लिए विदा किया जाएगा।
18 वर्षों से मां की सेवा में जुटी हैं मोनिका शाह
प्रतिमा निर्माण की सेवा में पिछले 18 वर्षों से मोनिका शाह भी लगातार जुटी हुई हैं। उन्होंने बताया कि मां नंदा-सुनंदा की सेवा करने में उन्हें बेहद आनंद और सुकून मिलता है। हर वर्ष उन्हें इस बात का बेसब्री से इंतजार रहता है कि कब मां की प्रतिमा निर्माण और सेवा का अवसर मिलेगा।
मोनिका शाह का कहना है कि मां की सेवा उनके लिए केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आस्था और समर्पण का विषय है। वर्षों से इस सेवा से जुड़े होने के कारण महोत्सव और प्रतिमा निर्माण का समय उनके लिए विशेष भावनात्मक महत्व रखता है।

























