नैनीताल में  मां दुर्गा देवी का डोला नगर भ्रमण के साथ दुर्गा महोत्सव हुआ समापन

नयना देवी मंदिर से निकला मां दुर्गा का डोला, नगर भ्रमण के दौरान उमड़ा आस्था का सैलाब; छतों से बरसाए गए फूल, जयकारों से गूंजा सरोवर नगरी

रिपोर्टर गुड़डू सिंह ठठोला

नैनीताल। सरोवर नगरी नैनीताल में विजयदशमी के पावन अवसर पर मां दुर्गा की विदाई के साथ दुर्गा महोत्सव का विधि-विधान से समापन हो गया। मां दुर्गा को विदाई देने के लिए नयना देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। मंदिर में दर्पण आरती और पारंपरिक सिंदूर खेला का आयोजन किया गया। इसके बाद ठीक 12 बजे देवी भोग अर्पित किया गया और मां दुर्गा के डोले को नगर भ्रमण के लिए रवाना किया गया। इस दौरान पूरा शहर मां दुर्गा के जयकारों से गूंज उठा और श्रद्धालु भावुक मन से मां को अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते नजर आए।

16 अक्टूबर से नैनीताल में बंगाली समुदाय की ओर से दुर्गा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा था। पांच दिनों तक चले इस धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव में मां दुर्गा की विधिवत पूजा-अर्चना, पुष्पांजलि और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए। विजयदशमी के दिन परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ महोत्सव का समापन हुआ।

सिंदूर खेला बंगाली समुदाय की दुर्गा पूजा की प्रमुख परंपराओं में से एक है। इसमें लाल सिंदूर को शक्ति, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक माना जाता है। महिलाओं ने मां दुर्गा से परिवार की सुख-शांति और जीवन में प्रेम एवं सकारात्मकता बनाए रखने की प्रार्थना की।

सिंदूर खेला के दौरान जहां महिलाओं में उत्साह देखने को मिला, वहीं मां दुर्गा की विदाई की घड़ी नजदीक आने के साथ ही श्रद्धालु भावुक भी हो गए।

नगर भ्रमण के दौरान स्कूली बच्चों की ओर से रंगारंग झांकियां निकाली गईं, जिन्होंने आयोजन की शोभा बढ़ाई। जगह-जगह श्रद्धालुओं ने डोले का स्वागत किया। व्यापारियों और स्थानीय लोगों ने मां दुर्गा के डोले पर पुष्पवर्षा की, वहीं कई लोग अपने घरों की छतों से फूल बरसाकर मां को भावभीनी विदाई देते नजर आए।

पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। मां दुर्गा के जयकारों के बीच श्रद्धालु डोले के साथ चलते रहे और मां के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते रहे। नगर भ्रमण के बाद मां दुर्गा की प्रतिमा को देर रात नैनी झील में विसर्जित किए जाने का कार्यक्रम निर्धारित था।

मां दुर्गा की विदाई के दौरान बनारस से नैनीताल पहुंचीं रजनी ठाकुर ने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि वह पहली बार इस आयोजन में शामिल हुई हैं और मां दुर्गा के प्रति उनकी गहरी आस्था है। उन्होंने बताया कि वह नवरात्रि का व्रत भी रखती हैं और बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी से आई हैं।

रजनी ठाकुर ने कहा कि मां दुर्गा को विदा करते समय मन बहुत भारी हो जाता है। सिंदूर खेला उनके लिए बचपन की यादों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि वह बिहारी हैं, लेकिन बंगाली संस्कृति और परंपराओं का भी पालन करती हैं। मां की विदाई का यह क्षण उनके लिए बेहद भावुक है।

उन्होंने कहा कि अब मां के दर्शन और इस उत्सव के लिए एक साल इंतजार करना होगा। मां से बिछड़ना किसी को अच्छा नहीं लगता। सभी श्रद्धालु यही कामना करते हैं कि मां अगले वर्ष फिर आएं और इसी हर्षोल्लास के साथ दुर्गा महोत्सव मनाने का अवसर मिले।

सिंदूर खेला के महत्व पर उन्होंने कहा कि महिलाएं मां दुर्गा से अपने अखंड सौभाग्य और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं। लाल रंग शक्ति का प्रतीक है और मां से प्रार्थना की जाती है कि वह सभी को शक्ति प्रदान करें तथा लोगों के जीवन को प्रेम और खुशियों से भर दें।

पांच दिनों की सेवा के बाद मां की विदाई पर छलके आंसू: डॉली भट्टाचार्य

दुर्गा महोत्सव में सक्रिय रूप से शामिल रहीं डॉली भट्टाचार्य ने कहा कि मां दुर्गा के आगमन का इंतजार पूरे साल रहता है। मां के स्वागत के लिए काफी पहले से तैयारियां शुरू हो जाती हैं। पांच दिनों तक श्रद्धालु दिन-रात मां की सेवा में जुटे रहते हैं, लेकिन जब विदाई का समय आता है तो मन भावुक हो उठता है।

उन्होंने बताया कि पुष्पांजलि के समय भी वह भावुक हो गई थीं और उनकी आंखों से आंसू निकल आए। मां की विदाई के बाद मंदिर और आयोजन स्थल पर पहले जैसी रौनक नहीं रहेगी, यह सोचकर मन उदास हो जाता है।

डॉली भट्टाचार्य ने बंगाली परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि मां दुर्गा को बेटी के रूप में देखा जाता है, जो अपने मायके आती हैं। जिस तरह मायके आई बेटी का स्वागत किया जाता है और उसे उसकी पसंद के व्यंजन खिलाकर खुशी-खुशी विदा किया जाता है, उसी तरह मां दुर्गा को भी पूरे प्रेम और सम्मान के साथ विदाई दी जाती है, ताकि वह अपने ससुराल लौटते समय प्रसन्न रहें।

उन्होंने कहा कि मां की विदाई दुख का क्षण जरूर है, लेकिन इसमें अगले वर्ष उनके दोबारा आगमन की आशा भी जुड़ी होती है।

मंजू रौतेला ने भी मां दुर्गा की विदाई के अवसर पर अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा कि श्रद्धालु पूरे साल इस पर्व का इंतजार करते हैं और मां के आगमन के लिए तैयारियां करते हैं। पांच दिनों तक पूजा-अर्चना और सेवा के बाद जब मां को विदा करने का समय आता है, तो हर किसी का मन भावुक हो जाता है।

उन्होंने कहा कि सभी की यही कामना है कि मां दुर्गा अपने आशीर्वाद के साथ अगले वर्ष फिर आएं और सभी को एक बार फिर हर्षोल्लास के साथ यह पर्व मनाने का अवसर मिले।

सिंदूर खेला की परंपरा पर उन्होंने कहा कि सुहागिन महिलाएं मां से अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। लाल सिंदूर शक्ति का प्रतीक है और इसके माध्यम से मां से परिवार में सुख-शांति, प्रेम और खुशहाली बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है।

अगले वर्ष फिर मां के स्वागत की उम्मीद के साथ हुआ महोत्सव का समापन

नैनीताल में दुर्गा महोत्सव का समापन धार्मिक आस्था, पारंपरिक रीति-रिवाजों और भावनाओं के संगम के रूप में देखने को मिला। नयना देवी मंदिर से निकले मां दुर्गा के डोले के नगर भ्रमण में स्थानीय नागरिकों, व्यापारियों, महिलाओं, स्कूली बच्चों और पर्यटकों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी की।

फूलों की वर्षा, रंगारंग झांकियों और मां दुर्गा के जयकारों के बीच श्रद्धालुओं ने मां को विदाई दी। पांच दिनों तक चले इस आयोजन ने नैनीताल में बंगाली संस्कृति और धार्मिक परंपराओं की जीवंत झलक प्रस्तुत की।

मां दुर्गा की विदाई के साथ ही श्रद्धालुओं के मन में अगले वर्ष उनके फिर आगमन की उम्मीद जाग उठी। सभी ने मां से सुख, शांति, समृद्धि और शक्ति का आशीर्वाद मांगा तथा अगले वर्ष फिर इसी श्रद्धा और उल्लास के साथ दुर्गा महोत्सव मनाने का संकल्प व्यक्त किया।

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