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लद्दाख के सियाचिन बेस कैंप में एक विनाशकारी हिमस्खलन हुआ, जिसमें तीन भारतीय सैन्यकर्मियों की दुखद मृत्यु हो गई। बचाव दल वर्तमान में जीवित बचे लोगों का पता लगाने और इस प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान का आकलन करने के लिए खोज और राहत कार्यों में लगे हुए हैं।

नियंत्रण रेखा (एलओसी) के उत्तरी सिरे पर लगभग 20,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित सियाचिन ग्लेशियर अपने दुर्गम भूभाग और चरम मौसम के लिए जाना जाता है।

इस क्षेत्र में तापमान अक्सर हड्डियों को कंपा देने वाले -60 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है, जिससे जीवित रहना और सैन्य अभियान चलाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। यहाँ तैनात सैनिकों के लिए हिमस्खलन एक आम खतरा है।

यह हालिया घटना सियाचिन क्षेत्र में घातक हिमस्खलनों की श्रृंखला में एक और कड़ी है। 2021 में, सब-सेक्टर हनीफ में एक हिमस्खलन हुआ था, जिसमें दो सैनिक मारे गए थे।

इस त्रासदी के बावजूद, छह घंटे के भीषण अभियान के बाद कई अन्य सैनिकों और पोर्टरों को बचा लिया गया था। इसी तरह, 2019 में, 18,000 फीट की ऊँचाई पर एक चौकी के पास गश्त कर रहे चार सैनिकों और दो पोर्टरों की एक भीषण हिमस्खलन में जान चली गई थी।

3 फ़रवरी, 2016 को, 19,600 फीट की ऊँचाई पर एक और विनाशकारी हिमस्खलन में दस सैनिक दब गए थे। इनमें लांस नायक हनमनथप्पा कोप्पड़ भी शामिल थे, जो शुरुआत में तो बच गए थे, लेकिन कुछ दिनों बाद उनके कई अंग फेल हो गए थे।

सियाचिन ग्लेशियर को अक्सर अपनी अत्यधिक ऊँचाई और प्रतिकूल वातावरण के कारण दुनिया का सबसे ऊँचा युद्धक्षेत्र कहा जाता है। यहाँ सैनिकों को दुश्मन की कार्रवाई के अलावा शीतदंश, हाइपोक्सिया और हिमस्खलन जैसे कई खतरों का सामना करना पड़ता है।।

हाल की त्रासदी इस रणनीतिक क्षेत्र की रक्षा में लगे भारतीय सैनिकों के सामने मौजूद मौजूदा जोखिमों को रेखांकित करती है। अधिकारियों ने बचाव अभियान तेज़ कर दिया है और ग्लेशियर की कठोर परिस्थितियों से निपटने के लिए विशेष टीमों को तैनात किया है।

भारतीय सेना इस ख़तरनाक क्षेत्र में तैनात कर्मियों की बेहतर सुरक्षा के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल की समीक्षा जारी रखे हुए है।

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