दूध के दाम बढ़ाने की मांग 15 अक्टूबर से आंदोलन करेंगे पशुपालक। दुग्ध संघ पर लगाया शोषण का आरोप, दूध के दाम 61 व 71 रुपए प्रति लीटर करने की मांग।

चंपावत। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पशुपालन और डेयरी व्यवसाय को बढ़ावा देने के सरकारी दावों के बीच चंपावत जिले के पशुपालकों ने दूध के खरीद मूल्य में बढ़ोतरी की मांग तेज कर दी है। लंबे समय से हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागू करने की मांग कर रहे पशुपालकों ने अब आंदोलन का रास्ता अपनाने का ऐलान किया है। पशुपालकों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लिया तो 15 अक्टूबर से दुग्ध संघ कार्यालय चंपावत में अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू किया जाएगा।

इसी क्रम में शनिवार को क्षेत्र के पशुपालक किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष कार्तिक उपाध्याय के नेतृत्व में चंपावत जिला मुख्यालय स्थित कलेक्ट्रेट पहुंचे। यहां उन्होंने जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर प्रस्तावित आंदोलन की जानकारी दी। पशुपालकों ने सरकार से गाय और भैंस के दूध का उचित मूल्य निर्धारित करने के साथ ही डेयरी व्यवसाय से जुड़े लोगों की समस्याओं का समाधान करने की मांग उठाई।

पशुपालकों का कहना है कि दूध के उत्पादन पर लगातार खर्च बढ़ रहा है, लेकिन खरीद मूल्य में अपेक्षित वृद्धि नहीं की जा रही है। ऐसे में पशुपालन करना आर्थिक रूप से मुश्किल होता जा रहा है। उन्होंने मांग की कि हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखंड में भी गाय के दूध का मूल्य 61 रुपये और भैंस के दूध का मूल्य 71 रुपये प्रति लीटर निर्धारित किया जाए, ताकि पशुपालकों को उनकी मेहनत का उचित लाभ मिल सके।

पशु आहार और दवाओं की बढ़ती कीमतों से बढ़ा आर्थिक संकट

पशुपालकों ने कहा कि पिछले कुछ समय में पशु आहार, दवाओं और पशुओं की देखभाल पर होने वाला खर्च काफी बढ़ गया है। इसके बावजूद दूध का खरीद मूल्य कम होने से डेयरी व्यवसाय से होने वाली आय और खर्च के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो गया है।

उन्होंने बताया कि चंपावत जिले में कई युवाओं ने रिवर्स पलायन कर अपने गांवों में स्वरोजगार शुरू करने की पहल की है। अनेक युवाओं ने बैंकों से ब्याज पर ऋण लेकर डेयरी व्यवसाय स्थापित किया, ताकि गांव में रहकर आजीविका कमा सकें। लेकिन दूध का उचित मूल्य नहीं मिलने और दुग्ध संघ की ओर से अपेक्षित सहयोग न मिलने के कारण अब कई डेयरी संचालकों के सामने व्यवसाय जारी रखने का संकट खड़ा हो गया है।

पशुपालकों ने चिंता जताई कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आर्थिक नुकसान के चलते युवा डेयरी व्यवसाय बंद करने को मजबूर हो सकते हैं। इससे न केवल स्वरोजगार की संभावनाएं प्रभावित होंगी, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों में पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचेगा।

पशुपालकों ने बताया कि दूध के दाम बढ़ाने की मांग को लेकर क्षेत्र की दुग्ध समितियों और पशुपालकों की ओर से पहले भी दो बार जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजे जा चुके हैं। इसके बावजूद अभी तक उनकी मांगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

उन्होंने कहा कि एक ओर सरकार युवाओं को स्वरोजगार अपनाने और पलायन रोकने के लिए प्रोत्साहित करती है, वहीं दूसरी ओर डेयरी व्यवसाय से जुड़े लोगों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। पशुपालकों के अनुसार, यदि दूध का खरीद मूल्य लागत के अनुरूप निर्धारित नहीं किया गया तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और युवाओं को गांवों में रोजगार देने के प्रयासों को झटका लग सकता है।

मांग पूरी नहीं हुई तो 15 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन आंदोलन

किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष कार्तिक उपाध्याय ने कहा कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार को पशुपालकों की समस्याओं को गंभीरता से समझना होगा। केवल स्वरोजगार अपनाने की अपील करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पशुपालकों को उचित मूल्य, सुविधाएं और जरूरी सहयोग भी उपलब्ध कराना होगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने गाय के दूध का मूल्य 61 रुपये और भैंस के दूध का मूल्य 71 रुपये प्रति लीटर निर्धारित करने की मांग पर जल्द निर्णय नहीं लिया तो 15 अक्टूबर से जिले के पशुपालक दुग्ध संघ कार्यालय चंपावत में अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू करेंगे।

पशुपालकों ने कहा कि प्रस्तावित आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता। उन्होंने चेतावनी दी कि आंदोलन की स्थिति उत्पन्न होने पर इसकी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन और दुग्ध संघ की होगी।

अब देखना होगा कि पशुपालकों की इस मांग और आंदोलन की चेतावनी के बाद शासन-प्रशासन तथा दुग्ध संघ की ओर से क्या कदम उठाए जाते हैं।

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