नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल के यूजीसी-एमएमटीटीसी हर्मिटेज स्थित देवदार हॉल में कुमाऊं विश्वविद्यालय एवं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी), बेंगलुरु के संयुक्त तत्वावधान में चार दिवसीय एएनआरएफ पेयर प्रोजेक्ट के तहत राष्ट्रीय सेमिनार एवं कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। सेमिनार का मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों एवं शोधार्थियों को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान, उन्नत तकनीकों और शोध में नवाचार की संभावनाओं से परिचित कराना है।
उद्घाटन सत्र में कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सतपाल सिंह बिष्ट ने शोधार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि शोध की शुरुआत जिज्ञासा और सवाल पूछने से होती है।
शोधार्थियों को पहले सवाल खड़े करने चाहिए, ताकि उनके भीतर नई चीजों को जानने की जिज्ञासा पैदा हो। उन्होंने कहा कि बेहतर शोध और नवाचार के माध्यम से ही देश विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
कार्यक्रम में प्रो. नंद गोपाल साहू ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया, जबकि प्रो. गीता तिवारी ने सेमिनार की रूपरेखा और इसके उद्देश्यों की जानकारी दी।
आईआईएससी बेंगलुरु के प्रो. सत्यम श्रीवास ने कहा कि भारत को तकनीकी क्षेत्र में चीन जैसे देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए अत्याधुनिक और स्वदेशी तकनीक विकसित करने की आवश्यकता है। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण वैज्ञानिक शोध बेहद जरूरी है।
मुख्य अतिथि एवं पूर्व कुलपति प्रो. दीवान सिंह रावत ने ऑनलाइन माध्यम से कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि कुमाऊं विश्वविद्यालय को एएनआरएफ पेयर प्रोजेक्ट मिलना विश्वविद्यालय में हो रहे उच्च स्तरीय शोध का परिचायक है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से ही देश और समाज को नई दिशा दी जा सकती है।
यूजीसी-एमएमटीटीसी के निदेशक प्रो. संजय पंत ने कहा कि विकास के लिए आवश्यक नई तकनीक शोध से ही सामने आती है। उन्होंने शोधार्थियों से वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ नई तकनीकों और नवाचार पर काम करने का आह्वान किया।
उद्घाटन सत्र का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ। इस दौरान अतिथियों को शॉल ओढ़ाकर, प्रतीक चिन्ह एवं पुष्पगुच्छ भेंट करने के साथ उत्तराखंड की पारंपरिक टोपी पहनाकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. महेंद्र राणा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. संतोष उपाध्याय ने किया।
वैज्ञानिक शोध में असफल प्रयोग भी बन सकते हैं सफलता का आधार
सेमिनार के प्रथम तकनीकी सत्र में प्रो. प्रवीण ने लिक्विड इलेक्ट्रोमाइग्रेशन के क्षेत्र में किए गए अपने शोध एवं तकनीकी उपलब्धियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने क्रैक क्लोजर एवं मैटेरियल हीलिंग से संबंधित विकसित तकनीक की जानकारी दी।
उन्होंने शोधार्थियों को बताया कि वैज्ञानिक अनुसंधान में असफल प्रयोग भी भविष्य की महत्वपूर्ण सफलताओं का आधार बन सकते हैं। उन्होंने शोध में रचनात्मकता बनाए रखने तथा नए विचारों और प्रयोगों को अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास नई तकनीकों और पेटेंट के विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। उनका कहना था कि शोध एक ऐसी यात्रा है, जो हमेशा सीधी दिशा में आगे नहीं बढ़ती। इसलिए शोध प्रक्रिया का आनंद लेते हुए निरंतर सीखते और आगे बढ़ते रहना चाहिए।
की-नोट स्पीकर एवं पेयर प्रोजेक्ट डायरेक्टर प्रो. सत्यम श्रीवास ने एक्स-रे डिफ्रेक्शन (XRD) के सिद्धांत एवं इसके विभिन्न वैज्ञानिक अनुप्रयोगों पर विस्तार से व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि एक्स-रे डिफ्रेक्शन तकनीक का उपयोग पदार्थों की फेज संरचना, क्रिस्टल संरचना, लैटिस पैरामीटर एवं क्रिस्टल सममिति के अध्ययन में किया जाता है। इसके अलावा इससे क्रिस्टलाइट आकार, माइक्रोस्ट्रेन, अवशिष्ट तनाव और क्रिस्टल दोषों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सकती है। सत्र का संचालन प्रो. वीणा पांडे ने किया।
एडवांस मैटेरियल और अगली पीढ़ी की एआई तकनीक पर चर्चा
दूसरे तकनीकी सत्र में आईआईएससी बेंगलुरु के प्रो. भगवती प्रसाद ने एडवांस्ड मैटेरियल एंड डिवाइसेज फॉर नेक्स्ट जेनरेशन एआई विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने उन्नत सामग्रियों एवं आधुनिक उपकरण संरचनाओं के विकास में हो रहे नवीनतम शोध पर प्रकाश डाला।
उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान में उपलब्ध उन्नत माइक्रोस्कोपी तथा अन्य अत्याधुनिक शोध सुविधाओं की जानकारी देते हुए बताया कि इन सुविधाओं का उपयोग उच्च स्तरीय वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए किस प्रकार किया जा रहा है। उन्होंने अपने शोध के तहत विकसित किए जा रहे अल्ट्रा-लो-पावर मैग्नेटोइलेक्ट्रिक मेमोरी डिवाइसेज के बारे में भी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि उनके शोध कार्यों के परिणामस्वरूप कई पेटेंट विकसित किए गए हैं।
प्रो. भगवती प्रसाद ने अपने औद्योगिक अनुभवों को साझा करते हुए जल शोधन से संबंधित फिल्टर प्रणाली के विकास पर किए गए कार्य की जानकारी भी दी। उनके व्याख्यान से वैज्ञानिक अनुसंधान, मूलभूत विज्ञान, उन्नत तकनीक और औद्योगिक अनुप्रयोगों के बीच संबंधों को समझने का अवसर मिला।
सल्फोन्स, सेमीकंडक्टर और चिप निर्माण पर विशेषज्ञों ने दिए व्याख्यान
इसके बाद कालीकट विश्वविद्यालय के प्रो. राजीव एस. मेनन ने सल्फोन्स की विशिष्टता एवं उनके उपयोग द्वारा हेटरोसाइक्लिक संरचनाओं के निर्माण विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने सल्फोन्स के विशिष्ट रासायनिक गुणों और कार्बनिक संश्लेषण में उनकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
डॉ. पूनम बेंजवाल ने सेमीकंडक्टर एवं चिप निर्माण विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने सेमीकंडक्टर के मूलभूत सिद्धांतों, उनके महत्व तथा आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में उनकी भूमिका की जानकारी दी। साथ ही चिप निर्माण की प्रक्रिया और विभिन्न क्षेत्रों में सेमीकंडक्टर तकनीक के बढ़ते उपयोग पर प्रकाश डाला। द्वितीय तकनीकी सत्र का संचालन प्रो. ललित तिवारी ने किया।
सेमिनार में डॉ. अर्चना सह नेगी, डॉ. महेश चंद्र आर्या, डॉ. पेनी जोशी, डॉ. दीपशिखा जोशी, डॉ. गिरीश चंद्र खरकवाल, डॉ. आंचल अनेजा, डॉ. मोहित रौतेला, डॉ. दीपक मेलकानी सहित लता, शीतल, भावना समेत करीब 195 शोधार्थी मौजूद रहे।
आयोजकों के अनुसार सेमिनार के दूसरे दिन भी विशेषज्ञों के महत्वपूर्ण व्याख्यान आयोजित किए जाएंगे, जबकि तीसरे दिन शोधार्थियों को प्रयोगशालाओं में विभिन्न अत्याधुनिक उपकरणों के संचालन एवं उपयोग की व्यावहारिक ट्रेनिंग दी जाएगी।





































