कदली वृक्ष को देववृक्ष मानकर की गई पूजा-अर्चना, मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का बनेगा आधार; जयकारों से गूंजा मंगोली गांव

नैनीताल। श्री नंदा देवी महोत्सव के 124वें वर्ष की धार्मिक एवं पारंपरिक यात्रा के तहत कदली वृक्ष चयन की महत्वपूर्ण रस्म शनिवार को शुरू हुई। इसी क्रम में श्री राम सेवक सभा का दल कदली वृक्ष के चयन के लिए मंगोली गांव पहुंचा।

यहां पहुंचने पर परंपरागत विधि-विधान के साथ कदली वृक्ष का पूजन किया गया। धार्मिक अनुष्ठान के दौरान कदली वृक्ष पर अक्षत अर्पित कर चयन की परंपरा निभाई गई। इस दौरान भजन-कीर्तन का आयोजन भी हुआ और पूरा क्षेत्र मां नंदा-सुनंदा के जयकारों से गूंज उठा।

नंदा देवी महोत्सव की धार्मिक परंपराओं में कदली वृक्ष का विशेष महत्व माना जाता है। इसी कदली वृक्ष से मां नंदा और सुनंदा की प्रतिमाओं का आधार तैयार किया जाता है। इसलिए कदली वृक्ष के चयन से लेकर उसकी पूजा और महोत्सव में उपयोग तक की पूरी प्रक्रिया धार्मिक मान्यताओं एवं सदियों पुरानी परंपराओं के अनुरूप संपन्न की जाती है।

धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व

वैदिक एवं पौराणिक परंपराओं में कदली यानी केले के वृक्ष को सामान्य वनस्पति नहीं, बल्कि अत्यंत पवित्र और देववृक्ष के रूप में माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कदली वृक्ष में देव शक्तियों का वास माना जाता है। इसे भगवान विष्णु, देवगुरु बृहस्पति और माता लक्ष्मी से भी जोड़ा जाता है।

शास्त्रीय मान्यताओं में कदली के मूल भाग में भगवान विष्णु, मध्य भाग में देवगुरु बृहस्पति और अग्रभाग में भगवान शिव का वास माना गया है। इसके पीले रंग के फूल और फल को ज्ञान, बुद्धि, समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पद्धतियों में कदली वृक्ष एवं उसके पत्तों का विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है।

कदली को कर्म बंधन से मुक्ति और निष्काम भावना का प्रतीक भी माना गया है। धार्मिक दृष्टि से यह शुद्धता, समर्पण और जीवन के आध्यात्मिक चक्र का प्रतीक मानी जाती है।

आयुर्वेद में भी कदली का विशेष महत्व

कदली का महत्व केवल धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। आयुर्वेदिक एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से भी केला अत्यंत उपयोगी माना जाता है। केले में पोटैशियम, मैग्नीशियम, फाइबर, विटामिन बी-6 और विभिन्न एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो शरीर के लिए उपयोगी पोषक तत्व हैं।

कदली के विभिन्न हिस्सों का अलग-अलग रूप में उपयोग किया जाता है। इसके फल के साथ पत्ते, फूल और तने का भी धार्मिक, पारंपरिक और उपयोगी कार्यों में इस्तेमाल होता है। वैदिक परंपरा में यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों में कदली के पत्तों को पवित्र माना गया है।

भजन-कीर्तन के साथ गूंजे मां नंदा-सुनंदा के जयकारे

मंगोली गांव में कदली वृक्ष चयन कार्यक्रम के दौरान धार्मिक वातावरण देखने को मिला। विधि-विधान से पूजन के बाद भजन आयोजित किए गए। श्रद्धालुओं और ग्रामीणों ने मां नंदा-सुनंदा के जयकारे लगाए। कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों में भी खासा उत्साह दिखाई दिया।

श्री राम सेवक सभा के दल ने स्थानीय ग्रामीणों एवं जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में कदली वृक्ष की पूजा-अर्चना कर महोत्सव की आगामी धार्मिक परंपराओं के लिए प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

इन लोगों ने किया प्रतिभाग

कदली वृक्ष चयन कार्यक्रम में बीडीसी सदस्य मुकेश मेहरा, दीवान सिंह, गोविंद सिंह, गणेश सिंह, हिम्मत सिंह, पंकज मेहरा, सचिन मेहरा, राजन सिंह, ग्राम प्रधान दीवान सिंह, भगवान सिंह, नैन सिंह, चंदन सिंह, ममता मेहरा और हंसीसी मेहरा सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।

वहीं श्री राम सेवक सभा की ओर से बिमल चौधरी, भुवन बिष्ट, गोधन सिंह, हीरा, मोहित लाल साह एवं हरीश राणा ने कार्यक्रम में प्रतिभाग किया।

कदली वृक्ष चयन की इस धार्मिक रस्म के साथ ही श्री नंदा देवी महोत्सव के 124वें वर्ष की तैयारियों और धार्मिक परंपराओं का औपचारिक रूप से महत्वपूर्ण चरण आगे बढ़ गया है। मंगोली में संपन्न हुई पूजा-अर्चना ने महोत्सव की धार्मिक गरिमा और सदियों पुरानी लोक परंपराओं को एक बार फिर जीवंत कर दिया।

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