जुबिन नौटियाल के पिता रामशरण ने बीजेपी छोड़ थामा कांग्रेस का हाथ, चकराता सीट पर सियासी समीकरण बदले

बीजेपी से नाराजगी के बाद कांग्रेस में वापसी, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बदले राजनीतिक समीकरण; चकराता सीट पर मुकाबला दिलचस्प होने के आसार

देहरादून। बॉलीवुड के मशहूर गायक जुबिन नौटियाल की आवाज के दीवाने देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में हैं। हालांकि, इन दिनों उनके पिता और उत्तराखंड के वरिष्ठ नेता रामशरण नौटियाल अपनी सियासी पारी को लेकर चर्चा में हैं। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से लंबे समय से चली आ रही नाराजगी के बाद रामशरण नौटियाल ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है। उनके इस फैसले को उत्तराखंड की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। खासकर चकराता विधानसभा क्षेत्र में इसका असर देखने को मिल सकता है, जहां लंबे समय से कांग्रेस का दबदबा रहा है।

रामशरण नौटियाल की कांग्रेस में वापसी ऐसे समय हुई है, जब प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीतियां तैयार करनी शुरू कर दी हैं। उनके इस कदम से चकराता क्षेत्र में नए राजनीतिक समीकरण बनने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। हालांकि, इसका वास्तविक चुनावी प्रभाव आने वाले समय में ही स्पष्ट हो सकेगा।

सम्मान न मिलने की नाराजगी के बाद छोड़ी बीजेपी

रामशरण नौटियाल देहरादून जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं और क्षेत्रीय राजनीति में उनकी अपनी पहचान रही है। उन्होंने वर्ष 2014 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामा था। इसके बाद उन्होंने चकराता विधानसभा क्षेत्र में पार्टी को मजबूत करने के लिए काम किया और वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर चुनाव भी लड़ा।

हालांकि, पार्टी में उचित सम्मान और राजनीतिक भूमिका को लेकर उनकी नाराजगी की चर्चाएं लगातार सामने आती रही थीं। उन्होंने बीजेपी से इस्तीफा देते समय पार्टी में सम्मान नहीं मिलने का मुद्दा उठाया था। इसके बाद उनके अगले राजनीतिक कदम को लेकर अटकलें तेज हो गई थीं। आखिरकार उन्होंने कांग्रेस में वापसी कर अपनी पुरानी पार्टी के साथ नई राजनीतिक शुरुआत की है।

राजनीतिक जानकारों की नजर में यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम है, क्योंकि रामशरण नौटियाल चकराता क्षेत्र में बीजेपी के प्रमुख स्थानीय चेहरों में शामिल रहे हैं। ऐसे में उनके पार्टी छोड़ने से बीजेपी को अपने संगठन और क्षेत्रीय नेतृत्व की रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।

गणेश गोदियाल, कुमारी शैलजा और यशपाल आर्य की मौजूदगी में कांग्रेस में वापसी

रामशरण नौटियाल ने उत्तराखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव कुमारी शैलजा और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य की मौजूदगी में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की।

उनकी कांग्रेस में वापसी को पार्टी के लिए क्षेत्रीय स्तर पर संगठन मजबूत करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस को उम्मीद हो सकती है कि नौटियाल के अनुभव और स्थानीय संपर्कों का लाभ पार्टी को मिलेगा। दूसरी ओर, बीजेपी के लिए यह चुनौती होगी कि वह चकराता में अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट रखते हुए कांग्रेस के सामने मजबूत विकल्प पेश करे।

हालांकि, किसी भी नेता के पार्टी बदलने से चुनावी नतीजे अपने आप तय नहीं हो जाते। स्थानीय संगठन, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, विकास से जुड़े मुद्दे और मतदाताओं का रुझान ही अंततः चुनाव की दिशा निर्धारित करेंगे।

करीब 20 करोड़ रुपये की संपत्ति, 2022 में बीजेपी के टिकट पर लड़े थे चुनाव

रामशरण नौटियाल की राजनीतिक पहचान के साथ-साथ उनकी आर्थिक स्थिति भी चर्चा में रही है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान दाखिल चुनावी हलफनामे के मुताबिक, उनके पास करीब 20 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति थी। हलफनामे में लगभग 1.08 करोड़ रुपये की देनदारी का भी उल्लेख बताया गया था। इसके अतिरिक्त उनके पास वर्ष 2006 में खरीदी गई एक रिवॉल्वर होने की जानकारी भी सामने आई थी।

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें चकराता सीट से उम्मीदवार बनाया था। इस चुनाव में रामशरण नौटियाल को 27,417 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के प्रीतम सिंह ने 36,853 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी।

दोनों उम्मीदवारों के बीच वोटों का अंतर 9,436 रहा था। इस परिणाम से स्पष्ट हुआ कि चकराता में कांग्रेस की पकड़ मजबूत बनी हुई थी और बीजेपी को जीत हासिल करने के लिए अतिरिक्त राजनीतिक प्रयासों की जरूरत थी।

चकराता विधानसभा सीट: कांग्रेस का मजबूत गढ़

उत्तराखंड की चकराता विधानसभा सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है और प्रदेश की महत्वपूर्ण राजनीतिक सीटों में गिनी जाती है। राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 से 2022 तक हुए पांचों विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रीतम सिंह ने जीत दर्ज की है। इस लगातार जीत के कारण चकराता को कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता है।

प्रीतम सिंह से पहले उनके पिता स्वर्गीय गुलाब सिंह भी इस क्षेत्र की राजनीति में प्रभावशाली रहे थे। उपलब्ध राजनीतिक विवरणों के मुताबिक, गुलाब सिंह उत्तर प्रदेश विधानसभा में आठ बार विधायक चुने गए थे। इस तरह चकराता में प्रीतम सिंह के परिवार की राजनीतिक पकड़ लंबे समय से बनी हुई है।

चकराता क्षेत्र में जौनसारी समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका है। यहां स्थानीय सामाजिक समीकरण, क्षेत्रीय मुद्दे और परंपरागत राजनीतिक संबंध चुनावों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में किसी भी पार्टी के लिए केवल बड़े नेताओं के समर्थन से चुनाव जीतना आसान नहीं होता, बल्कि स्थानीय स्तर पर मजबूत संगठन और मतदाताओं के विश्वास की भी अहम भूमिका रहती है।

बीजेपी के सामने स्थानीय नेतृत्व की चुनौती

चकराता में बीजेपी लंबे समय से कांग्रेस के मजबूत जनाधार को चुनौती देने का प्रयास करती रही है। वर्ष 2022 में रामशरण नौटियाल को मैदान में उतारना इसी रणनीति का हिस्सा था। लेकिन चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

क्षेत्रीय राजनीति में बीजेपी के भीतर नेताओं के प्रभाव और आपसी खींचतान को लेकर भी समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। विकासनगर के विधायक मुन्ना सिंह चौहान और उनके परिवार का क्षेत्रीय राजनीतिक प्रभाव भी इस संदर्भ में चर्चा का विषय रहा है। रामशरण नौटियाल की नाराजगी के पीछे पार्टी के भीतर सम्मान और भूमिका से जुड़े मुद्दों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अब उनके कांग्रेस में शामिल होने के बाद बीजेपी के सामने यह चुनौती होगी कि वह चकराता में अपने संगठन को मजबूत बनाए और ऐसा स्थानीय नेतृत्व सामने लाए, जो प्रीतम सिंह की राजनीतिक पकड़ को चुनौती दे सके। वहीं, कांग्रेस के लिए भी नौटियाल की वापसी के बाद संगठनात्मक तालमेल बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।

जुबिन नौटियाल की लोकप्रियता का कितना मिलेगा लाभ?

रामशरण नौटियाल के राजनीतिक सफर की चर्चा में उनके बेटे और मशहूर गायक जुबिन नौटियाल का नाम भी अक्सर सामने आता है। जुबिन की लोकप्रियता देश-विदेश में है और उनके प्रशंसकों की बड़ी संख्या है। हालांकि, किसी लोकप्रिय कलाकार के परिवार से जुड़ाव का सीधा असर चुनावी वोटों में कितना बदलता है, यह स्थानीय परिस्थितियों और मतदाताओं की पसंद पर निर्भर करता है।

चकराता के युवाओं के बीच रामशरण नौटियाल की स्वीकार्यता और उनके स्थानीय संपर्क कांग्रेस के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि उनकी कांग्रेस में वापसी से युवा मतदाताओं का रुझान निर्णायक रूप से बदल जाएगा। इसके लिए पार्टी को क्षेत्रीय मुद्दों, रोजगार, शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य और विकास जैसे सवालों पर भी अपनी रणनीति स्पष्ट करनी होगी।

प्रीतम सिंह के साथ तालमेल होगा अहम

रामशरण नौटियाल की कांग्रेस में वापसी के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चकराता में उनकी राजनीतिक भूमिका क्या होगी और वह प्रीतम सिंह के साथ किस तरह तालमेल स्थापित करेंगे। प्रीतम सिंह इस सीट से लगातार चुनाव जीतते आए हैं और क्षेत्र में उनका मजबूत जनाधार माना जाता है।

ऐसे में कांग्रेस के सामने एक ओर नौटियाल के अनुभव और स्थानीय संपर्कों का लाभ उठाने का अवसर है, तो दूसरी ओर पार्टी के मौजूदा नेतृत्व के साथ समन्वय बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है। यदि दोनों नेताओं के बीच बेहतर तालमेल बनता है, तो कांग्रेस को संगठनात्मक स्तर पर मजबूती मिल सकती है। हालांकि, आगामी चुनाव में उनकी भूमिका और उम्मीदवार चयन को लेकर अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

2027 से पहले चकराता में दिलचस्प होगी सियासी लड़ाई

रामशरण नौटियाल का बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल होना उत्तराखंड की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक अहम घटनाक्रम है। इससे चकराता में राजनीतिक चर्चाएं तेज होना स्वाभाविक है। कांग्रेस इसे अपने मजबूत जनाधार को और विस्तार देने के अवसर के रूप में देख सकती है, जबकि बीजेपी के सामने अपनी रणनीति और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करने की चुनौती होगी।

फिलहाल चकराता की सियासत में नए समीकरणों की संभावना जरूर बनती दिख रही है, लेकिन चुनावी तस्वीर का अंतिम फैसला मतदाताओं के रुख, उम्मीदवारों की स्थिति, स्थानीय मुद्दों और दोनों दलों की चुनावी रणनीति पर निर्भर करेगा। अब देखना होगा कि रामशरण नौटियाल की कांग्रेस में वापसी वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में कितना असर डालती है और क्या बीजेपी इस सीट पर कांग्रेस के लंबे समय से चले आ रहे दबदबे को चुनौती दे पाती है।

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