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उत्तराखंड में 228 विधानसभा कर्मचारियों की बर्खास्तगी पर HC सख्त, 2016 से पहले की नियुक्तियों का मांगा ब्योरा
नैनीताल। उत्तराखंड विधानसभा सचिवालय से बर्खास्त किए गए कर्मचारियों से जुड़े मामले में बुधवार को नैनीताल हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान 2016 से पहले नियुक्त किए गए कर्मचारियों से संबंधित नियुक्ति दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति देने संबंधी याचिकाकर्ताओं का प्रार्थना पत्र निरस्त कर दिया। कोर्ट ने संबंधित कर्मचारियों की नियुक्तियों से जुड़े दस्तावेज शपथपत्र के माध्यम से प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही विधानसभा सचिवालय को इन दस्तावेजों पर अपनी आपत्ति प्रस्तुत करने को कहा गया है। मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 अक्टूबर की तिथि निर्धारित की गई है।
सुनवाई के दौरान बर्खास्त कर्मचारियों की ओर से कहा गया कि उनकी नियुक्तियां वैध थीं और उन्हें तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया गया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि विधानसभा अध्यक्ष को कर्मचारियों की नियुक्ति करने का अधिकार प्राप्त था और उन्होंने विधानसभा सचिवालय में नियमित कर्मचारियों की तरह अपनी सेवाएं दी हैं।
वहीं, विधानसभा सचिवालय की ओर से इन दलीलों का विरोध किया गया। सचिवालय की ओर से कहा गया कि जिन कर्मचारियों की नियुक्तियां नियमों के अनुरूप नहीं थीं, उन्हें नियमानुसार सेवा से हटाया गया है। आरोप लगाया गया कि संबंधित नियुक्तियां निर्धारित नियमावली का पालन किए बिना की गई थीं। सचिवालय की ओर से यह भी कहा गया कि विधानसभा अध्यक्ष को इस तरह से नियुक्तियां करने का अधिकार नहीं था।
सुनवाई के दौरान यह भी पक्ष रखा गया कि विधानसभा सचिवालय में बिना विज्ञप्ति जारी किए 228 कर्मचारियों को नियुक्तियां दी गई थीं। इसी आधार पर बाद में इन नियुक्तियों की वैधता को लेकर सवाल उठे और कर्मचारियों को सेवा से हटा दिया गया।
225 से अधिक कर्मचारियों ने दी थी चुनौती
विधानसभा सचिवालय से हटाए गए कर्मचारी बबिता भंडारी, भूपेंद्र सिंह, कुलदीप सिंह समेत 225 अन्य कर्मचारियों ने अपनी बर्खास्तगी के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विधानसभा अध्यक्ष की ओर से लोकहित को ध्यान में रखते हुए उनकी सेवाएं 27, 28 और 29 सितंबर 2022 को समाप्त कर दी गई थीं।
याचिकाकर्ताओं ने बर्खास्तगी आदेश पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें सेवा से हटाने का स्पष्ट आधार नहीं बताया गया और न ही बर्खास्तगी से पहले उनका पक्ष सुना गया। उनका कहना है कि उन्होंने विधानसभा सचिवालय में नियमित कर्मचारियों की तरह अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है, इसके बावजूद उन्हें सेवा से बाहर कर दिया गया।
2001 से 2005 के बीच नियुक्तियों और नियमितीकरण का भी उठा मुद्दा
याचिकाकर्ताओं की ओर से सुनवाई के दौरान विधानसभा सचिवालय में पूर्व में हुई नियुक्तियों और नियमितीकरण का मुद्दा भी उठाया गया। उनका कहना है कि वर्ष 2001 से 2005 के बीच 396 पदों पर नियुक्तियां हुई थीं, जिन्हें बाद में नियमित किया जा चुका है।
याचिकाकर्ताओं का यह भी तर्क है कि वर्ष 2014 तक तदर्थ आधार पर नियुक्त किए गए कुछ कर्मचारियों को चार वर्ष से कम की सेवा के बाद ही नियमित नियुक्ति दे दी गई, जबकि उन्होंने छह वर्ष से अधिक समय तक सेवा देने के बावजूद नियमितीकरण का लाभ नहीं पाया। इसके बाद उन्हें सेवा से भी हटा दिया गया।
अब नियुक्ति दस्तावेजों पर रहेगी नजर
हाई कोर्ट के बुधवार के आदेश के बाद मामले में 2016 से पहले नियुक्त कर्मचारियों से जुड़े नियुक्ति दस्तावेज महत्वपूर्ण हो गए हैं। कोर्ट ने इन दस्तावेजों को शपथपत्र के माध्यम से प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इसके बाद विधानसभा सचिवालय को दस्तावेजों पर अपनी आपत्ति दाखिल करनी होगी।
अब मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी, जिसमें नियुक्तियों से जुड़े दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर मामले की आगे की सुनवाई होगी।

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