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उच्च न्यायालय ने भीमताल में आदमखोर बाघ द्वारा तीन लोगों के अपना निवाला बनाए जाने पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई की 

रिपोर्टर – गुड्डू सिंह ठठोला

नैनीताल। उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने भीमताल में आदमखोर बाघ द्वारा 3 लोगों को अपना निवाला बनाए पर उन्हें वन विभाग द्वारा उनको बिना चिन्हित किए सीधे मारने की अनुमति दिए जाने के मामले में स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई की।

आज सुनवाई पर वन विभाग ने कहा कि आदमखोर बाघ को जंगलिया गाँव मे ट्रेंकुलाइज कर लिया गया। और बाघ का आतंक खत्म हो गया है। पकड़ी गई बाघिन ने ही 3 लोगों की जान ली जिसकी डीएनए रिपोर्ट आने पर पुष्टि हो जाएगी। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने याचिका को निस्तारित कर दिया।

        आपकों बता दे भीमताल में दो महिलाओं को मारने वाले हिंसक जानवर को नरभक्षी घोषित करते हुए उसे मारने के चीफ वाइल्डलाइफ वार्डेन के आदेश का स्वतः संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने सुनवाई थी ।

खंडपीठ ने कोर्ट ने वन अधिकारियों से गुलदार को मारने की अनुमती देने के प्रावधान के बारे में जानकारी ली तो वो ठीक से इसका जवाब नहीं दे सके। उन्होंने कहा कि वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट की धारा 13ए में खूंखार हमलावर जानवर को मारने की अनुमती दी जाती है ।

उन्होंने इसे पकड़ने के व पहचान करने के लिए 5 पिजड़े व 36 कैमरे लगा रखे है। जिसपर न्यायालय ने उनसे पूछा कि गुलदार था या बाघ था ? उसे मारने के बजाए रैस्क्यू सेंटर भेजा जाना चाहिए।

न्यायालय ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि हिंसक जानवर को मारने के लिए चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डेन की संतुष्टि होनी जरूरी है नाकि किसी नेता के आंदोलन की।

वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन की धारा 11ए के तहत तीन परीस्थितियों में किसी जानवर को मार सकते हैं। उसे पहले उस क्षेत्र से खदेड़ जाएगा, फिर ट्रेंक्यूलाइज कर रैस्क्यू सेंटर में रखा जाएगा और अंत मे मारने जैसा अंतिम कठोर कदम उठाया जा सकता।

लेकिन विभाग ने बिना जांच के सीधे मारने के आदेश दे दिए। उन्हें यही पता नही कि बाघ है या गुलद्वार। उसकी पहचान भी नही हुई।

न्यायालय ने यह भी कहा था कि घर का बच्चा अगर बिगड़ जाता है तो उसे सीधे मार थोड़ा ना दिया जाता है। क्षेत्र वासियों के आंदोलन के बाद मारने के आदेश कैसे दे दिए किसने मारा आपको कोई पता नही।

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